
- विनोद मिश्रा
बांदा। जिले में एक नाम ऐसा है, जिसे सुनते ही अफसरों के दरवाज़े ‘खुद-ब-खुद’ खुल जाते हैं। विभागों के ‘गलियारों में फुसफुसाहटें’ बढ़ जाती हैं ‘ठेकेदार सुरेश गुप्ता’ आये हैं। सूत्रों की मानें तो बांदा में इनका ‘जलजला’ ऐसा है कि मलाईदार विभागों में इनकी ‘बल्ले बल्ले’ है ! कहते हैं ‘श्री लक्ष्मी जी सदा सहाय’ वाली भूमिका इनकी ओर हर तरफ दिखाई देती है ? सत्ता दल हो या विपक्ष ठेकेदार सुरेश गुप्ता पर राजनीतिक कृपा का छत्रछाया हमेशा बना रहता है, जिससे जांच की आंच तक नहीं पहुंच पाती ? सूत्र बताते हैं जिस कार्यालय में सुरेश गुप्ता का कदम पड़ जाए, वहाँ अफसरों का व्यवहार ‘लल्ला-लल्ला लोरी, दूध की कटोरी’ जैसा हो जाता है ? यानी, स्वागत सत्कार इतना गर्मजोशी वाला कि बाकी ठेकेदार हतप्रभ ! कथित तौर पर विभागों में इन्हें एक तरह का स्पेशल प्रिविलेज मिला हुआ है ? कई अफसर तो मज़ाक में कहते सुने जाते हैं ‘सुरेश जी आए मतलब काम आधा तो वैसे ही हो गया’ !

सूत्र यह भी बताते हैं ठेकेदार सुरेश को दिए जाने वाले निर्माण कार्यों में ‘दूध की नदी’ जैसा कमाई का रेशियो बहता है ? इस दूध की ‘मलाई-रबड़ी’ कार्यदायी विभागों के ‘टॉप टू बॉटम’ अधिकारियों व कर्मचारियों तक ‘मीठे स्वाद’ के रूप में पहुंच जाती है ? यही कारण बताया जाता है कि गुणवत्ता पर सवाल उठने के बावजूद जांच को आंच नहीं आती ? शहर और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में सुरेश गुप्ता द्वारा किए गए कई निर्माण कार्यों पर गुणवत्ता को लेकर गंभीर आरोप लगते रहे हैं ! सड़कों पर बार-बार उभरते गड्ढे, नालियों का जल्दी क्षतिग्रस्त होना, भवनों में शुरुआती दरारें और मानक के विपरीत सामग्री इस्तेमाल होने की शिकायतें ! लेकिन हर बार शिकायतों का अंत फाइलों की धूल और अफसरों की चुप्पी में ही होता है ?

सूत्रों का कहना है ‘ऐसा कोई सूरमा भोपाली’ नहीं दिखता जो इनके कामों की ‘असली जांच’ का बीड़ा उठाए।’ ठेकेदार सुरेश गुप्ता इन सभी ‘आरोपों को बेतुका’ बताते है। उनका कहना है ‘हमारे सभी कार्य सरकारी मानकों और गुणवत्ता के अनुसार होते हैं। सभी विभागीय प्रक्रियाएं पारदर्शी हैं,आरोप लगाने वाले गलतफहमी फैला रहे हैं। इस सफाई के इतर जिले में ठेकेदार सुरेश गुप्ता का प्रभाव, विभागों की अनोखी मेहरबानियां, राजनीतिक छत्रछाया और जांच में उदासीनता ये सब मिलकर पूरे प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर प्रश्नचिह्न सा लगा रहे हैं ? क्या विभागों की चुप्पी, कथित ‘मलाईदार रेशियो’ का नतीजा है?
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