
- विनोद मिश्रा
बांदा। दिवाली की जगमगाहट, दीपों की रोशनी और खुशियों के बीच बुंदेलखंड की धरती पर आज भी एक अनोखी और रोमांचक परंपरा देखने को मिलती है जिसे कहा जाता है “मौनिए दिवारी”। यह परंपरा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोक संस्कृति का जीवंत उदाहरण है जहाँ गाय और सुअर का युद्ध दिवाली के पांच दिवसीय पर्व का सबसे बड़ा आकर्षण बन जाता है। बुंदेलखंड के बांदा और आसपास के गांवों में जब गोवर्धन पूजा और भैया दूज का त्योहार आता है, तो गांवों में युद्ध का मैदान सज जाता है। युवक ग्वालों का रूप धरते हैं, शरीर पर मिट्टी मलते हैं और ढोल की थाप पर नाचते हुए इस परंपरा की शुरुआत करते हैं।

ढोल की गूंज और लोगों की जयकारों के बीच एक सुअर को युद्ध के मैदान में छोड़ा जाता है और फिर गाय उसे पैरों से रौंदती है। यह युद्ध तब तक चलता है, जब तक सुअर या तो मर नहीं जाता या लहूलुहान होकर भाग नहीं जाता। लोग इसे “बुराई पर अच्छाई की जीत” का प्रतीक मानते हैं और युद्ध समाप्त होते ही दिवारी नृत्य के साथ अपनी खुशी व्यक्त करते हैं। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के समय से जुड़ी मानी जाती है। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने गो का रूप धारण कर अपने खुरों से एक राक्षसी सुअर का वध किया था, जिससे यह आयोजन ‘गाय द्वारा असुर वध’ के प्रतीक के रूप में शुरू हुआ। इसी स्मृति में बुंदेलखंड के ग्रामीण हर साल गोवर्धन पूजा के अवसर पर मौनिए दिवारी का आयोजन करते हैं।
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