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महेश्वरी देवी मंदिर: जहां मिट्टी से प्रकट हुई आस्था, शक्ति पीठों में होती है गणना

शरद मिश्रा सम्पादक सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • शरद मिश्रा

बांदा। जिला मुख्यालय के हृदय स्थल में स्थित मां महेश्वरी देवी का प्राचीन मंदिर सिर्फ़ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल भी है। यह मंदिर देवी शक्तिपीठों में गिना जाता है। नवरात्र के समय यहां मेला लगता है। देवी मां की महिमा और इस मंदिर का इतिहास लोगों के दिलों में आज भी गूंजता है।

बांदा में शिला के रूप में प्रकट हुई थी महेश्वरी देवी: शक्ति पीठों में है गणना

कहा जाता है कि जहां आज यह मंदिर स्थित है, वहां कभी बलखण्ड पाताल नामक घना जंगल था। उस समय बांदा छोटा कस्बा था,बस छोटी बाजार, खुटला और अर्दली बाजार था। जहां आज कलेक्टर गंज है वहां बड़ा तालाब हुआ करता था। कुम्हार इसी तालाब से मिट्टी निकालकर बर्तन बनाते थे। इसी मिट्टी की खुदाई के दौरान माहेश्वरी कुम्हार को पत्थर की शिला रूपी देवी प्रतिमा मिली। यह प्रतिमा इतनी गहराई में दबी थी कि आसपास की मिट्टी हटाकर उसे निकाला गया। तब से इस शिला की पूजा शुरू हुई और धीरे-धीरे यह स्थल आस्था का केंद्र बन गया।

बांदा में शिला के रूप में प्रकट हुई थी महेश्वरी देवी: शक्ति पीठों में है गणना

आज भी नवरात्र की अष्टमी और नवमी को देवी भक्त गीत गाते हैं, जिनमें इस कथा का ज़िक्र आता है “तीसर कुदाली मारी जब कुम्हार ने, लाल ध्वजा फहराई देई मां”। यह लोकगीत इस मंदिर की प्राचीनता और भक्तों की गहरी आस्था का जीवंत प्रमाण हैं। किंवदंती है कि महेश्वरी नामक एक हिन्दू कारीगर मस्जिद निर्माण में काम करता था। मस्जिद से बची सामग्री वह देवी की प्रतिमा के लिए मढ़िया बनाने में लगा देता था। एक दिन बांदा के नवाब ने उसे दिये की रोशनी में मंदिर निर्माण करते देखा। नवाब ने आदेश दिया कि वह पहले मंदिर का निर्माण करे, मस्जिद का बाद में।

बांदा में शिला के रूप में प्रकट हुई थी महेश्वरी देवी: शक्ति पीठों में है गणना

यही वह क्षण था जिसने बांदा में हिन्दू-मुस्लिम एकता की नींव डाली। नवाब ने मंदिर निर्माण को संरक्षण दिया, लेकिन आंधी-पानी से बना मंदिर टूट गया। बाद में चौधरी पहलवान सिंह के परिवार ने इस मंदिर का निर्माण कराया और इसे स्थायी स्वरूप दिया।

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मां महेश्वरी के मंदिर में आज भी 24 घंटे अखंड दीप जलता है। भक्तों का विश्वास है कि यहां की गई हर प्रार्थना पूरी होती है। मंदिर की बनावट प्राचीन देवी शक्तिपीठों की तर्ज पर की गई है। शारदीय और चैत्र नवरात्र में मंदिर परिसर आस्था के महासागर में बदल जाता है।

 

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

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