
- विनोद मिश्रा
बांदा। कभी “धान का कटोरा” कहे जाने वाले इस जिले में एक बार फिर बासमती और परसन जैसे सुगंधित चावलों की खेती का जलवा लौटने वाला है। वर्षों तक सरकारी क्रय केंद्रों पर पतले और खुशबूदार धान की खरीद न होने से किसान मोटे धान की ओर झुक गए थे, लेकिन अच्छे दाम और बढ़ती मांग ने एक बार फिर उनकी सोच बदल दी है।

इस साल जिले में 63 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में धान की रोपाई की गई है, जिसमें करीब 60 हजार हेक्टेयर में सुगंधित धान लगाया गया है। अकेले नरैनी और अतर्रा क्षेत्र में ही लगभग 30 हजार हेक्टेयर में पतले धान की रोपाई हुई है। पिछले साल पतले धान को अच्छे दाम मिलने से किसानों का भरोसा लौटा है। सरकारी बीज भंडार में बासमती और परसन के बीज उपलब्ध न होने के बावजूद किसानों ने बाजार से बीज खरीदकर रोपाई की है।

प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह का कहना है कि सरकार को पतले धान की भी खरीद सरकारी क्रय केंद्रों पर बाजार दर पर करनी चाहिए और भुगतान समय पर सुनिश्चित करना चाहिए। वहीं किसान मोहम्मद असलम का कहना है कि मोटा धान देर से तैयार होता है और कम दाम मिलता है, जिससे रबी की फसल पर असर पड़ता है। बासमती और परसन जैसे सुगंधित चावलों की विश्व बाजार में मांग लगातार बढ़ रही है। किसानों का मानना है कि अगर जिले में बासमती चावल की प्रोसेसिंग इकाई स्थापित हो जाए, तो न सिर्फ किसानों की आमदनी दोगुनी होगी, बल्कि बांदा फिर से धान के कटोरे के रूप में अपनी पहचान हासिल कर लेगा।
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