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रानी लक्ष्मी बाई की “राखी और पाती” पर अंग्रेजों से लोहा लेने पहुंच गया था 'बांदा का नवाब', दिलचस्प है कहानी !
उत्तर प्रदेश

रानी लक्ष्मी बाई की ‘राखी और पाती’ पर अंग्रेजों से लोहा लेने पहुंच गया था ‘बांदा का नवाब’, दिलचस्प है कहानी !

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विनोद कुमार मिश्रा ( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )

  • विनोद मिश्रा

बांदा। भाई-बहन के प्रेम और रिश्ते का पर्व रक्षाबंधन पूरे देश में भाईचारे का संदेश देता है, लेकिन बुंदेलखंड की धरती पर यह त्योहार सांप्रदायिक सौहार्द का भी जीवंत प्रतीक है। इस परंपरा की जड़ें सीधे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी हैं, जब झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने बांदा के तत्कालीन नवाब अली बहादुर सानी को राखी भेजी थी। यह राखी सिर्फ रक्षा का वचन नहीं, बल्कि मातृभूमि की आज़ादी के लिए रणभूमि में उतरने का आह्वान थी।

रानी लक्ष्मी बाई की “राखी और पाती” पर अंग्रेजों से लोहा लेने भाग गया था बांदा नवाब, दिलचस्प है कहानी !

1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजी फौज ने झांसी के किले को चारों ओर से घेर लिया था। रानी लक्ष्मीबाई सीमित संसाधनों के साथ किले में फंसी थीं। अंग्रेजों के तोप-कैनन गरज रहे थे और हर दिन स्थिति गंभीर होती जा रही थी। ऐसे समय में रानी ने अपने विश्वासपात्र पत्रवाहक दुलारे लाल को बुलाया और उनके हाथ बांदा के नवाब के नाम एक राखी और हस्तलिखित पत्र सौंपा। यह पत्र चैत्र सुदी संवत 1914 (ईस्वी 1857) में शुद्ध बुंदेली भाषा में लिखा गया था। उसमें रानी ने लिखा था “भाई, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना बहुत जरूरी है। आपके आने से हमारी ताकत बढ़ेगी। शीघ्र मदद को पहुंचें।”

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इतिहासकार बताते हैं कि जैसे ही नवाब अली बहादुर सानी ने राखी और पत्र देखा, उन्होंने इसे अपने सीने से लगाया और उसी क्षण निर्णय ले लिया “अब अंग्रेजों को जवाब मिलेगा”। नवाब ने एक पल की भी देरी न करते हुए 10 हज़ार सैनिकों की विशाल फौज के साथ झांसी की ओर कूच कर दिया। नवाब की सेना के पहुंचने से पहले रानी लक्ष्मीबाई किले से निकलकर कालपी की ओर जा चुकी थीं। लेकिन नवाब और अंग्रेजी फौज के बीच झांसी के बाहर भीषण मुठभेड़ हुई। गोलियों और तोपों की गूंज से आसमान कांप उठा। इतिहास दर्ज करता है कि इस संघर्ष में अंग्रेजी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा और उनके कई सैनिक रणभूमि में ढेर हो गए।

रानी लक्ष्मी बाई की “राखी और पाती” पर अंग्रेजों से लोहा लेने भाग गया था बांदा नवाब, दिलचस्प है कहानी !

यह घटना सिर्फ एक युद्ध नहीं थी, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता और भाई-बहन के रिश्ते की वह मिसाल थी, जिसमें धर्म, जाति और मज़हब की दीवारें टूटकर सिर्फ एक लक्ष्य सामने था मातृभूमि की रक्षा। रानी और नवाब के बीच बंधी राखी की डोर ने आज़ादी की लड़ाई को और मजबूत कर दिया था। आज भी बुंदेलखंड में रक्षाबंधन का पर्व उसी भावना के साथ मनाया जाता है। यहां मुस्लिम बहनें हिंदू भाइयों को राखी बांधती हैं और हिंदू बहनें भी अपने मुस्लिम भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। बुंदेलखंड के लोग मानते हैं कि यह त्योहार हमें 1857 की उस ऐतिहासिक राखी की याद दिलाता है, जिसने न सिर्फ भाई-बहन का रिश्ता निभाया, बल्कि आज़ादी की जंग में सांप्रदायिक सौहार्द की अमर मिसाल पेश की।

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

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