
- विनोद मिश्रा
बांदा। अवैध कब्जे और अतिक्रमण के चलते सार्वजनिक तालाबों की धरोहर तेजी से मिट रही है। इसे बचाने को जारी किए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी कुछ खास प्रभाव नहीं पड़ रहा। ज्यादातर तालाबों के भीटों पर अतिक्रमण हटने के बजाए और बढ़ा है। इस पर अधिकारी चुप्पी साधे हैं।

गौरतलब है कि तालाबों का अस्तित्व बचाने को कई वर्षाें पूर्व उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिए थे कि भीटों पर अतिक्रमण हटाए जाएं, लेकिन यह आदेश फाइलों से धरती पर नहीं उतर सका। जो अतिक्रमण जहां और जैसे थे बदस्तूर बरकरार हैं। बांदा शहर के साहब तालाब, हरदौल तलैया, छाबी तालाब इत्यादि इसकी बानगी हैं। इन तालाबों की भीटों की कौन कहे डूब क्षेत्र में भी निर्माण और अवैध कब्जे कर लिए गए हैं। यही हाल अतर्रा नगर का है। नरैनी रोड पर स्थित चार बीघा 12 बिस्वा के तालाब को जेसीबी और ट्रैक्टरों से मिट्टी से पाटकर कब्जे की कोशिश की गई। किसी समय में अतर्रा को सरोवरों का नगर कहा जाता था।

यहां छोटे-बडे़ लगभग डेढ़ दर्जन तालाब और तलैया थे लेकिन यह सब अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए। राजस्व विभाग ने परवाह नहीं की। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी बहुत प्रभावी नहीं हुए। नगर पालिका के अभिलेख बताते हैं कि मूसा तालाबा का रकबा 1.97 एकड़, धोबा तालाब का रकबा 1.14 एकड़, दामू तालाब 7.88 एकड़, गंगोही तालाब 4.93 एकड़, घुम्मा तालाब 3.32 एकड़, भवानी तालाब 2 एकड़, गुठिल्लापुरवा तालाब 0.85 एकड़, खटकन तलैया 0.68 एकड़, भीटा तालाब 11.1 एकड़ दर्ज हैं। इन सभी पर अवैध कब्जे हैं।
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