- विनोद मिश्रा
बांदा। अक्ल पर ताला पड़ जाये तो किसी भी कार्य का कबाड़ा हो जाता है। फिर उस कार्य में भ्रष्टाचार का संगम कोढ़ में खाजहो जाना स्वभाविक है। जिले में मनरेगा के तहत खोदे गए तालाब ज्यादातर इसी लिये उपयोगी नहीं है। कारण कि उनको बनाते समय न तो स्थान, न ही उनके कैचमेंट और न ही निकासी का ध्यान रखा गया है। इन कारणों से ये तालाब बहुत उपयोगी नहीं रह गए हैं। ज्यादातर सूखे पड़े हुए हैं। तालाबों को बनाने में न तो लोक ज्ञान का इस्तेमाल किया गया है, न ही परंपरागत ज्ञान का इस्तेमाल हुआ, न ही आधुनिक विज्ञान का। इनको बनाने में दबंगई, पैसा और लूट-खसोट का इस्तेमाल ज्यादा दिखता है। ये तालाब लोगों के संकट को बढ़ा ही रहे हैं।

बुंदेलखंड क्षेत्र में तालाबों की बहुत समृद्ध परंपरा रही है। आस-पास कितने ही अच्छे व पुराने पारंपरिक जल स्रोत देखे जा सकते हैं, पर हाल में बने इन तालाबों में न तो परंपरागत ज्ञान का प्रयोग किया गया और न ही आधुनिक विज्ञान का। उपयोगिता और गुणवत्ता को भुला दिया गया और जन-भागीदारी से बचा गया। इसमें धन तो बर्बाद होना ही था। अब भी गलती सुधारकर जन-भागीदारी से कार्य किया जाए, तो तस्वीर बदल सकती है।मनरेगा के तहत होने वाले काम में सबसे बड़ी संभावना जल संग्रहण और संरक्षण की थी, परध्यान नहीं दिया गया। बांदा जिले के नरैनी ब्लॉक में बने अनेक तालाबों को देखने में यही लगता है कि यह सुनहरा अवसर गंवा दिया गया है।यहां के 99 प्रतिशत तालाबों में न तो पानी है, न पानी आने का रास्ता, न ही जल-ग्रहण क्षेत्र का कोई ध्यान रखा गया है। करोड़ों रुपये की लागत और मजदूरों की मेहनत, सब बेकार चली गई। सहबाजपुर पंचायत के ‘मॉडल’ तालाब में घेराबंदी है, बैठने की पैड़ी बनी है, पर इसमें पानी आने का कोई रास्ता नहीं है। तालाब साल भर सूखा पड़ा रहता है। बच्चे इसमें कभी कबड्डी खेल लेते हैं, तो कभी क्रिकेट। कभी महिलाएं उपले पाथ लेती हैं। आस-पास के लोगों ने बताया कि इसमें मनरेगा के लगभग 20 लाख रुपये बर्बाद हुए। इसमें पानी नहीं बहता, भ्रष्टाचार बहता है, क्योंकि इसकी कई बार खुदाई दिखाकर पैसे प्राप्त किए गए हैं। थोड़ा आगे, चंद्रपुरा पंचायत के मोहरछा तालाब की भी यही हालत है। न पानी, और न पानी आने का मार्ग। काफी खुदाई की गई, बीच में एक कुआं या चेक वेल भी बनाया गया है। घेराबंदी है, बैठने की पटिया है, नहाने का स्थान है, नहीं है तो बस पानी और उसके आने की संभावना। यह तालाब भी साल भर सूखा ही रहता है। पशुओं को पानी पिलाने की नाद में एक बूंद पानी नहीं । इस सूखे तालाब के आस-पास कोई गांववासी नजर नहीं आता। तालाब के गेट पर बड़ा-सा ताला लगा है।

लगता है कि संबंधित अधिकारियों की अक्ल पर भी ताला पड़ा है। आखिर किस आधार पर ये जल-विहीन तालाब बनाए गए और इन्हें स्वीकृति दी गई? गांव का बच्चा भी जानता है कि जल-ग्रहण क्षेत्र और पानी आने के मार्ग के बिना तालाब का कोई मतलब नहीं। बात केवल एक तालाब की नहीं है। अकेले नरैनी ब्लॉक में ही बिलहरका, पंचमपुर, गड़हा, नौगंवा, सड़हा, परसाहर, कटरा-कालिंजर, आदि कितने ही पंचायती क्षेत्रों में मनरेगा के ये सफेद हाथी देखे जा सकते हैं। किसी तालाब का 15 लाख रुपये का बजट था, तो किसी का 20 लाख का। कितनी ही राशि बेकार हो गई।

सहबाजपुर के मॉडल तालाब के आस-पास लोगों से पूछा कि अगर यह बेकार था, तो आपने विरोध क्यों नहीं किया? पहले लोग चुप रहे, फिर बताया कि ताकतवर लोगों से कौन बैर मोल ले। बुंदेलखंड क्षेत्र में तालाबों की बहुत समृद्ध परंपरा रही है। आस-पास कितने ही अच्छे व पुराने पारंपरिक जल स्रोत देखे जा सकते हैं, पर हाल में बने इन तालाबों में न तो परंपरागत ज्ञान का प्रयोग किया गया और न ही आधुनिक विज्ञान का। उपयोगिता और गुणवत्ता को भुला दिया गया और जन-भागीदारी से बचा गया। इसमें धन तो बर्बाद होना ही था। अब भी गलती सुधारकर जन-भागीदारी से कार्य किया जाए, तो तस्वीर बदल सकती है। कम से कम नए जल संरक्षण कार्य ठीक से किए जा सकते हैं।

( शरद मिश्रा- संपादक )
( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )
![Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh](https://citynewsuttarpradesh.in/wp-content/uploads/2026/05/file_0000000055a072089a09490a85573f53-683x1024.png)
![Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh](https://citynewsuttarpradesh.in/wp-content/uploads/2026/05/file_00000000022872078732ec3f33441b29.png)
Notice: This report has been updated by City News Uttar Pradesh , . Full responsibility for the content of this report rests with City News Uttar Pradesh . Neither www.citynewsuttarpradesh.in nor the Editorial Board bears any responsibility.
