- विनोद मिश्रा
बांदा। नदियों में रात-दिन भारी-भरकम मशीनों से खनन, पेड़ों की अंधाधुंध कटान, क्रेशरों की धूल और धुआं से बुरी तरह प्रदूषित बुंदेलखंड में पांच जून को एक बार फिर विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की औपचारिकता पूरी हो गई।

दुर्भाग्य यह है कि पूर्ववर्ती प्रदेश सरकारों के कार्यकाल में भी बुंदेलखंड में करोड़ों पौध रोपे गए। करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन बुंदेलखंड में हरियाली राष्ट्रीय वन नीति के मानक के मुताबिक नहीं आ पाई।राष्ट्रीय वन नीति के तहत 33 फीसदी वन क्षेत्र होना चाहिए। जबकि बुंदेलखंड में मात्र 7.44 फीसदी वन क्षेत्र है। किसी भी जनपद में यह मानक पूरा नहीं है।

सूत्रों के अनुसार बुंदेलखंड के सातों जनपदों में लगभग तीन करोड़ पौधे रोपे जाएंगे। बांदा जनपद में लगभग 21लाख पौधों का लक्ष्य है। इसमें 8,96,690 पौधे वन विभाग लगाएगा। शेष 12,67,478 पौध रोपण की जिम्मेदारी अन्य विभागों को दी गई है।

विश्व पर्यावरण दिवस पर ग्राम प्रधान, रोजगार सेवक, वृक्ष अभिभावक, प्रगतिशील और पंजीकृत किसानों नें एक साथ पौधरोपण अभियान में भागीदारी की।प्रशासनिक एंव राजनीतिक “सुहावने” भाषणों के बीच पौध रोपण कार्यक्रम हुये। पौधशालाओं को आदर्श पर्यावरण स्थल के रूप में विकसित करने की कवायदें हुई। एक बार फिर पौधशालाएं सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनेंगी के दावे किये गये। इस प्रकार खाना -पूरी का असीम अनुपम नजारा देखने को मिला और गढ़े गये।
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