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August 26, 2026
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बुंदेलखंड में सावन परम्परायें विलुप्त : अब नहीं पड़ते झूले
उत्तर प्रदेश

बुंदेलखंड में सावन परम्परायें विलुप्त : अब नहीं पड़ते झूले …

 

  • विनोद मिश्रा

बांदा। बुंदेलखंडी जीवन शैली वैसे तो प्रकृति से सामंजस्य की अदभुत जीवन शैली है । यहां का हर त्यौहार , प्रकृति और लोक रंजन से जुड़ा है । पर अब शायद बुंदेलखंड की इस जीवन परम्परा को भी आधुनिकता का ग्रहण लग गया है । सावन की कई परम्पराए जो कभी लोगों के प्रकृति प्रेम और आपसी समन्वय और प्रेम को दर्शाती थी अब सिर्फ किस्से कहानियो तक सिमट कर रह गई हैं ।


वर्षा ऋतू में जब चारों और हरियाली व्याप्त हो ऐसे में किसका मन प्रफुल्लित ना होगा । ऐसे में बुंदेलखंड के घर – घर में ऊँचे वृक्ष की डाल पर झूले डाले जाते थे । धीरे – धीरे ये गाँव के झूलो तक पहुँच गए, और अब किसी किसी गांव में ही ये झूले और झूलों पर झूलती बालाएं देखने को मिलती हैं |

बुंदेलखंड में सावन परम्परायें विलुप्त : अब नहीं पड़ते झूले

सावन का महीना उल्लास और उमंग का महीना बुंदेलखंड में माना जाता था । गाँव – गाँव में महिलाये और बालिकाए गाँव में लगे मेहँदी के पेड़ से मेहँदी तोड़ कर लाती थी , उसे पीस कर आपस में लगाती थी , लोक मान्यता थी जिस कन्या के हाथ में जितनी गहरी मेहँदी रचेगी उसे उतना ही सुन्दर पति मिलेगा ।अब मेहँदी के वृक्ष बचे नहीं तो बाजार से अपनी सामर्थ्य अनुसार मेहँदी ले आती हैं।

बुंदेलखंड में सावन परम्परायें विलुप्त : अब नहीं पड़ते झूले
लोक जीवन की इन परम्पराओ की समाप्ति के पीछे का जो मुख्य कारण है वह आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में हम सब प्रकृति से अलग हो गए हैं । गाँव के घरो में लगे पेड़ कट गए , गाँव में लगे कुछेक वृक्ष किसी ना किसी की बपौती हो गए , उस पर उनके घर के लोगों के अलावा दूसरा कोई जा नहीं सकता । इस तरह से झूला की परम्परा समाप्त हो गई ।

बुंदेलखंड में सावन परम्परायें विलुप्त : अब नहीं पड़ते झूले
– लुप्त हुई सावनी भेजने की परम्परा 
प. श्रवण कुमार बताते हैं की सावन के महीना में बुंदेलखंड में सावनी भेजने की परम्परा थी । यह भी अब समाप्त सी हो गई है इसका स्थान अब पैसों ने ले लिया है । इस परम्परा में विवाहित महिला पहली बार जब सावन के महीने में अपने मायके आ जाती है । तब उसके पति के घर से उसके लिए सोने -चांदी की राखी , कपडे , लकड़ी के खेल खिलौने आदि भेजे जाते हैं ।ससुराल से आई राखी ही बहिन अपने भाई की कलाई पर बांधती है । इसका बाकायदा गाँव के लोगों को निमंत्रण दिया जाता था , वे लोग आकार सावनी में आये सामान को देखते थे । अब सावनी के सामान के स्थान पर पैसा भेज दिया जाता है ।


( शरद मिश्रा- संपादक )
( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )

 
 



Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh
 





 

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