
- विनोद मिश्रा
बांदा। तहसील नरैनी का गहबरा गांव के “ठाकुरदीन बाल्मीक की सोना उगल रही भूमि चर्चा” में हैं। यह वह जमीन है जिसे देखकर सब कहते थे “इसमें तो घास भी नहीं उगेगी”, आज “सोना उगल” रही है। इस “चमत्कार के पीछे किसी जादू का नहीं, बल्कि विद्याधाम समिति के जज्बे और सहयोग का हाथ” है।
कुछ साल पहले ठाकुरदीन को पट्टे में 7 बीघा जमीन मिली थी। लेकिन वो “जमीन ऊबड़-खाबड़ और पथरीली” थी। खेती दूर, बैल भी उसमें नहीं चल पाते थे। “आमदनी का कोई जरिया नहीं” था। “कर्ज सिर पर चढ़ता” गया। परिवार के सामने “दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा” हो गया। तब विद्याधाम समिति के सचिव राजा भइया आगे आए। संस्था ने ठाकुरदीन की 4 बीघा जमीन को समतल कराया, मिट्टी ठीक कराई और खेती लायक बनाया। बस फिर क्या था, किस्मत पलट गई।
आज उसी ‘बंजर जमीन में ज्वार, अरहर, मूंग, चना और गेहूं की फसलें लहरा’ रही हैं। घर में अनाज है, कर्ज खत्म है और चेहरे पर सुकून है। ठाकुरदीन का पूरा परिवार अब ‘सम्मान’ से जी रहा है। ठाकुरदीन की ‘आंखें भर’ आती हैं। वह कहते हैं की “सरकार ने जमीन तो दे दी थी, पर उसे खेती लायक बनाने वाला कोई नहीं” था। विद्याधाम समिति के राजा भइया ने “हाथ पकड़ा, तब जाकर यह जमीन सोना उगलने” लगी।
राजा भइया ने ‘भरोसा’ दिलाया है कि ‘बची हुई 2 बीघा जमीन को भी जल्द समतल कराया’ जाएगा, ताकि ठाकुरदीन की कृषि भूमि में उत्पादन और बढ़े। विद्याधाम समिति की यह पहल इस बात का सबूत है कि अगर नीयत साफ हो तो एक छोटी सी मदद से किसी की पूरी जिंदगी बदल सकती है। ‘बंजर जमीन भी सोना दे सकती है, बस उसे संवारने’ वाला चाहिए।
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