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भूख से 'तड़पता' गांव बोड़े पुरवा ? सूनी गोद बुझे चूल्हे औऱ रोती चौखटें, पेट को राशन कार्ड कब !
उत्तर प्रदेशबुंदेलखंड

भूख से ‘तड़पता’ गांव बोड़े पुरवा ? सूनी गोद बुझे चूल्हे औऱ रोती चौखटें, पेट को राशन कार्ड कब !

विनोद मिश्रा डायरेक्टर सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • विनोद मिश्रा

बांदा। नरैनी तहसील का बोडे पुरवा आज ‘गांव’ नहीं, ‘गम’ का पता बन गया है। यहां शाम ढले दीया नहीं जलता, चूल्हे की राख भी ‘ठंडी’ पड़ी है। वजह ? पेट की आग ने जवान बेटों को महानगरों की भट्ठी में झोंक दिया। पीछे छूट गईं सिर्फ कांपती लाठियां, सूनी मांगें और वो मासूम आंखें जो अब भी दरवाजे पर ‘माई-बापू’ की परछाई तलाशती हैं। गांव के बूढ़े जब बोलते हैं तो कलेजा फटता है ‘केन नदी हमारी मां थी, हमने उसी की कोख से सब्जी उगाकर पेट’ पाला। बालू माफियाओं ने छन्ना-छन्ना करके उसका सीना चीर दिया। आखिरी कण तक बालू नोच ली।

भूख से 'तड़पता' गांव बोड़े पुरवा ? सूनी गोद बुझे चूल्हे औऱ रोती चौखटें, पेट को राशन कार्ड कब !अब जहां कभी लौकी-तरोई लहलहाती थी, वहां नुकीले पत्थर ‘नागफनी’ से खड़े हैं। नंगा पैर रखो तो खून की धार, हल चलाओ तो फावड़ा ‘छन’ से टूट जाए। खेत प्यासे, नदी बंजर, और सिस्टम की आंखों पर ‘फाइलों की पट्टी’। जब उगाने को जमीन न बचे, सींचने को पानी न बचे, तो किसान ‘किसानी’ छोड़ ‘पलायन’ का बोझ उठा लेता है। बोडे पुरवा का हर दूसरा घर ‘ताला’ बन गया है। बच्चे पूछते हैं “दादी, रोटी क्यों नहीं है?” दादी आंचल से मुंह ढक लेती है, क्योंकि ‘भूख का जवाब’ किसी किताब में नहीं लिखा।

भूख से 'तड़पता' गांव बोड़े पुरवा ? सूनी गोद बुझे चूल्हे औऱ रोती चौखटें, पेट को राशन कार्ड कब !विद्या धाम समिति के सचिव राजा भइया जब गांव पहुंचे तो हर आंगन में ‘सन्नाटे का शोर’ मिला। एक बूढ़ी मां ने धोती के कोने से आंसू पोंछकर कहा बेटा, हम भिखारी नहीं, बस ‘केन’ वापस दे दो। नदी लौटेगी तो बेटे भी लौट आएंगेराजा भइया की आंख भी नम हुई। उन्होंने डीएम से गुहार लगाई “साहब, ये ‘आपदा’ प्राकृतिक नहीं, ‘माफियाकृत’ है। केन के कातिलों की जांच हो, बोडे पुरवा को ‘आपदा गांव’ घोषित कर पलायन के मारे परिवारों को आर्थिक भीख नहीं,’हक की रोटी’ दी जाए।

भूख से 'तड़पता' गांव बोड़े पुरवा ? सूनी गोद बुझे चूल्हे औऱ रोती चौखटें, पेट को राशन कार्ड कब !आज बोडे पुरवा में न शादी की शहनाई बजती है, न सावन के झूले पड़ते हैं। बस हर शाम एक सवाल हवा में तैरता है “जब नदी मर जाए, खेत हार जाए, और सरकार सो जाए, तो गांव वाला भूख से लड़े या ‘मौत’ से? काश, कोई ‘केन की कोख’ फिर से हरी कर दे। काश, कोई ‘पलायन की ट्रेन’ को वापस गांव मोड़ दे। तब तक बोडे पुरवा की बूढ़ी आंखें आसमान तकती हैं शायद अगला ‘निवाला’ वहीं से टपक जाए।

 
 



Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh
 





 

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