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बुंदेलखंड में 'कजली महोत्सव' की ऐतिहासिक रौनक: 'परंपरा और आस्था' का दिखा संगम
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बुंदेलखंड में ‘कजली महोत्सव’ की ऐतिहासिक रौनक: ‘परंपरा और आस्था’ का दिखा संगम

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

  • शरद मिश्रा

बांदा। सावन की रिमझिम, हरियाली की छटा और लोकगीतों की मिठास रविवार को बुंदेलखंड पूरी तरह कजली महोत्सव के रंग में रंगा नजर आया। बांदा शहर से लेकर ग्रामीण अंचल तक कजली विसर्जन और मेलों की रौनक ने लोगों को परंपराओं की जड़ों से जोड़ दिया। शहर, कस्बों और गांवों में जगह-जगह मेले लगे, महिलाओं के कजली गीत गूंजे और दंगल के दांव-पेंच ने माहौल को और जोशीला बना दिया।

बुंदेलखंड में 'कजली महोत्सव' की ऐतिहासिक रौनक: 'परंपरा और आस्था' का दिखा संगम

सुबह से ही बांदा के छाबी तालाब की ओर महिलाओं के जत्थों का तांता लगा रहा। रंग-बिरंगे वस्त्र, सिर पर सजी-धजी कजलियां और होंठों पर सावन के गीत यह नजारा शहर की परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रमाण था। विभिन्न मोहल्लों और गांवों से आई महिलाएं तालाब में कजलियों का विसर्जन करती रहीं, जबकि किनारे पर मेला लगा, जिसमें बच्चों की खिलखिलाहट और दुकानों की चहल-पहल ने उत्सव को और जीवंत बना दिया।

बुंदेलखंड में 'कजली महोत्सव' की ऐतिहासिक रौनक: 'परंपरा और आस्था' का दिखा संगम

शाम को नवाब टैंक में भी कजली विसर्जन हुआ, साथ ही दंगल का आयोजन, जिसमें पहलवानों ने दांव-पेच दिखाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। चंदेल कालीन परंपराओं से सजे कालिंजर में कजली महोत्सव का आयोजन ऐतिहासिक अंदाज में हुआ। दोपहर में नगर से भव्य शोभायात्रा निकली जिसमें हाथी, घोड़े, ऊंट और कजली लिए महिलाएं शामिल थीं।

बुंदेलखंड में 'कजली महोत्सव' की ऐतिहासिक रौनक: 'परंपरा और आस्था' का दिखा संगम

झांकियों में बुंदेलखंड के गौरव और आस्था की झलक थी आल्हा-ऊदल, सैय्यद चाचा, बौना चोर, पृथ्वीराज, मलहना का डोला, और भगवान शंकर की भव्य झांकी ने दर्शकों का मन मोह लिया। शोभायात्रा का समापन बेला तालाब पर हुआ, जहां पूरे नगर ने परंपरा का अनुपम नजारा देखा। शहर से लगे मवई गांव में कजली महोत्सव रक्षा बंधन के दिन ही मनाया गया। महिलाओं ने सावन और कजली गीतों की स्वर लहरियों के बीच गोसाईं तालाब में कजलियों का विसर्जन किया।

बुंदेलखंड में 'कजली महोत्सव' की ऐतिहासिक रौनक: 'परंपरा और आस्था' का दिखा संगम

यहां भी मेले जैसा दृश्य था बच्चे झूले झूलते, दुकानों पर मिठाइयां बिकतीं, और चारों ओर उत्साह का माहौल। कजली महोत्सव केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान है। यह पीढ़ियों से चली आ रही उस विरासत का प्रतीक है, जो सावन की हरियाली और लोकगीतों की धुन में सांस लेती है। छाबी तालाब से लेकर कालिंजर और मवई तक मंगलवार का दिन बुंदेलखंड के लिए आस्था, आनंद और अपनत्व का पर्व बन गया।

 

 

 

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