विनोद मिश्रा
सरकार ऩे कहा है की यूपी में 5 साल तक संविदा नौकरी के प्रस्ताव से घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है।पर सरकारका संविदा पर नौकरीकायह प्रस्ताव करोड़ों नौजवानों के सपनों पर एक ड्राम पानी उलट देगा, जो सोचते थे कि सरकार की स्थायी सेवा मिलेगी. जीवन में सुरक्षा रहेगी. प्राइवेट कंपनी भी 3 महीने की सेवा के बाद परमानेंट कर देती है। मगर सरकार 5 साल तक कांट्रेक्ट पर रखेगी।
अगर यह ख़बर सही है तो इस पर व्यापक बहस होनी चाहिए. अख़बार में छपी ख़बर के अनुसार उत्तर प्रदेश का कार्मिक विभाग यह प्रस्ताव ला रहा है कि समूह ख व ग की भर्ती अब 5 साल के लिए संविदा पर होगी. कांट्रेक्ट पर. पांच साल के दौरान जो छंटनी से बच जाएंगे उन्हें स्थायी किया जाएगा. इस दौरान संविदा के कर्मचारियों को स्थायी सेवा वालों का लाभ नहीं मिलेगा. यह प्रस्ताव करोड़ों नौजवानों के सपनों पर एक ड्राम पानी उलट देगा जो सोचते थे कि सरकार की स्थायी सेवा मिलेगी. जीवन में सुरक्षा रहेगी. प्राइवेट कंपनी भी 3 महीने की सेवा के बाद परमानेंट कर देती है मगर सरकार 5 साल तक कांट्रेक्ट पर रखेगी. व्यापक बहस करनी है तो मेहनत कीजिए. ज़रा पता कीजिए कि किन-किन राज्यों में यह व्यवस्था लागू की गई है और किए जाने का प्रस्ताव है।
गुजरात में नरेंद्र मोदी ने यह सिस्टम लागू किया. फिक्स पे सिस्टम कहते हैं. फिक्स पे सिस्टम में लोग कई साल तक काम करते रहे. पुलिस से लेकर शिक्षक की भर्ती में. उनकी सैलरी नहीं बढ़ी और न परमानेंट हुए. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वहां पर चार लाख कर्मचारी फिक्स सिस्टम के तहत भर्ती किए गए. 14 साल तक बिना वेतन वृद्धि के काम करते रहे. मामूली वृद्धि हुई होगी लेकिन स्थायी सेवा के बराबर नहीं हो सके. फिर इसके खिलाफ गुजरात हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई. 2012 में गुजरात हाईकोर्ट ने फिक्स पे सिस्टम को ग़ैर कानूनी घोषित कर दिया. कहा था कि इन्हें स्थायी सेवा के सहयोगियों के बराबर वेतन मिलना चाहिए और जब से सेवा में आए हैं उसे जोड़ कर दिया जाए. मिला या नहीं मिला, कह नहीं सकता. ज़रूर कम वेतन पर कई साल काम करने वाले 4 लाख लोगों का राजनीतिक सर्वे हो सकता है. पता चलेगा कि आर्थिक शोषण का राजनीतिक विकल्प से कोई संबंध नहीं है. आर्थिक शोषण से राजनीतिक निष्ठा नहीं बदलती है।राजनीतिक निष्ठा किसी और चीज़ से बनती है।
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