
- शरद मिश्रा
बांदा। बुंदेलखंड की धरती पर जब मानसून की पहली झमाझम बारिश गिरी, तो किसानों की उम्मीदें भी हरी हो उठीं। लेकिन इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया सरकारी बीज भंडारों की बदइंतजामी ने। सवा लाख हेक्टेयर में खरीफ की फसलें बोने का लक्ष्य तो बना लिया गया, लेकिन किसानों को बीज ही नहीं मिल रहे। बांदा, महोबा, चित्रकूट, ललितपुर, झांसी, जालौन और हमीरपुर के किसान दिनभर सरकारी बीज भंडारों के चक्कर काट रहे हैं। लेकिन न ज्वार है, न बाजरा, न मूंगफली, न तिल। ‘खाली गोदाम और खाली जेब’ लेकर किसान लौट रहे हैं।
किसानों का कहना है कि 15 जुलाई से पहले बोआई होनी जरूरी है, तभी फसलें पकेंगी और समय पर उत्पादन मिलेगा। लेकिन अब हालात यह हैं कि सरकारी गोदामों में बीज गायब हैं और अफसर जवाब देने से बच रहे हैं। तिल, ज्वार, कोदो, रागी, सावा, मूंगफली, अरहर और मक्का जैसे मोटे अनाज के बीज भंडारों से नदारद हैं। इस बार सरकार ने पिछले साल से 4,000 हेक्टेयर ज्यादा रकबे में बोआई का लक्ष्य दिया है, लेकिन बिना बीज के लक्ष्य कागज़ी ही रह जाएंगे। बुंदेलखंड के किसान दलहनी और तिलहनी फसलों के लिए तैयार हैं, लेकिन सरकारी आपूर्ति सिस्टम किसानों को तैयार नहीं होने दे रहा।
किसानों का कहना है की बीज नहीं तो खेत कैसे बोएं ? सरकारी बीज गोदाम केवल दिखावे के लिए हैं। प्राइवेट बीज बहुत महंगे हैं, हर किसान अफोर्ड नहीं कर सकता। अभी नहीं मिले तो मानसून की बारिश व्यर्थ जाएगी। यह क्षेत्र अरहर, ज्वार और बाजरे का उत्पादन केंद्र है, दलहनी फसलों की आत्मनिर्भरता का दारोमदार यहीं के किसानों पर बीज नहीं मिलने से रकबा घटेगा, उत्पादन घटेगा और किसान कर्ज़ में डूबेगा। कृषि विभाग के अधिकारी मौन हैं, मगर अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक विभाग भारी दबाव में है। बीज की उपलब्धता पर सवाल खड़े हैं, मगर अब तक कोई वैकल्पिक योजना नहीं सामने आई।
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