
- शरद मिश्रा
बांदा। कभी इस गली से गुजरते ही फूलों की भीनी-भीनी खुशबू स्वागत करती थी। आज उसी फूल मार्केट से गुजरना किसी सजा से कम नहीं। शहर के मुख्य बाजार का फूल मार्केट अब “फूल मार्केट” नहीं रहा। यह शूल मार्केट बन गया है। शूल यानी जाम के कांटे, और प्रशासनिक लापरवाही । यहां से गुजरने को तीन रास्ते हैं मुसीबत भरे हैं। चौक से शंकर गुरु की दुकान होते हुए जो रास्ता जाता है, वहीं फूल मार्केट आबाद है। इसके इर्द-गिर्द शहर की रौनक है मिठाई, सर्राफा, पुरानी बजाजी। लेकिन आज यही तीनों लाइफलाइन दम तोड़ रही हैं।
कोतवाली वाला रास्ता पुरानी बजाजी से होते हुए जाता ह़ै, यहां दिनभर जाम का आलम रहता ह़ै। डीएवी वाला रास्ता नवीन रावत की सर्राफा दुकान से गुजरता है यहां पैर रखने की जगह नहीं। चौक वाला रास्ता जहां से शुरू होते ही गाड़ियों की कतार रहती है। सबसे बड़ा शूल यह है कि फूल मार्केट अब फूल बेचने वालों का नहीं, दो पहिया वाहनों का पार्किंग स्टैंड बन गया है। दुकानदार सुबह आते ही अपनी बाइक-स्कूटी बीच सड़क में ठोक देते हैं। ग्राहक भी यही करते ह़ै। पटरी पर फूल की दुकान, सड़क पर गाड़ी और बीच में फंसी जनता। खुशबू की जगह अब धुएं और जाम की बदबू है।
विचारणीय यह है की रोजाना इतना जाम, इतनी शिकायतें फिर भी प्रशासन की आंखें बंद क्यों हैं ? क्या फूल विक्रेताओं की रोजी और आम जनता की तकलीफ वीआईपी के दौरे से कम जरूरी है? जनता की मांग ह़ै की ‘शूल हटाओ फूल बचाओ’। इसके लिये फूल मार्केट को शिफ्ट किया जाए। शहर में कहीं खाली जगह चिन्हित हो। नो-पार्किंग सख्ती से लागू हो। बीच सड़क पर खड़े वाहन उठाए जाएं, चालान हो। पटरी खाली हो ताकि पैदल चलने वालों को जगह मिले। कुल मिलाकर जिले का ‘दिल’ कहे जाने वाले इस बाजार को प्रशासन ने खुद बीमार कर दिया है। अगर अब भी शूल नहीं हटे, तो एक दिन ये बाजार अपनी सांसें खुद तोड़ लेगा।
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