
- विनोद मिश्रा
बांदा। शहर के “ऐतिहासिक और प्रमुख खेल मैदान राइफल क्लब” को नीलामी से बचाने के लिए “भाजपा जिलाध्यक्ष कल्लू राजपूत” द्वारा की गई “भीष्म प्रतिज्ञा” अब खुद उनके लिए “सांप-छछूंदर की स्थिति” बनती जा रही है ! कथित तौर पर “राजनीतिक अनुभवहीनता और अनाड़ी रणनीति” के चलते वे “न तो मैदान को बचाने की ठोस पहल कर पा रहे हैं! और न ही नीलामी के निर्णय से खुद को अलग दिखा पा रहे” हैं ! नीलामी की प्रक्रिया न रुकवा पानें से जनता व विपक्ष के तीखे सवालों का संतोषजनक जवाब भी दे पा रहे ? परिणामस्वरूप वह इस मुद्दे की राजनीतिक रणभूमि में चारों ओर से घिर चुके हैं !

स्थिति यह है कि तमाम दावों, बयानों और आश्वासनों के बावजूद राइफल क्लब मैदान का अस्तित्व खतरे में है। बांदा विकास प्राधिकरण ने मैदान के आधे हिस्से को व्यावसायिक उपयोग में लाने के लिए ई-टेंडर जारी कर दिया है, जिससे शहर की खेल विरासत पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

बीडीए द्वारा जारी ई-टेंडर के अनुसार 1 जनवरी से 17 जनवरी तक ऑनलाइन आवेदन स्वीकार किए जा रहे हैं, जबकि 21 जनवरी को नीलामी प्रक्रिया पूरी की जाएगी। प्राधिकरण ने मैदान के 4343 वर्ग मीटर क्षेत्रफल को कॉमर्शियल उपयोग के लिए चिह्नित किया है। इसकी न्यूनतम आरक्षित दर 62,700 रुपये प्रति वर्ग मीटर तय की गई है, जिससे कुल आरक्षित कीमत लगभग 28 करोड़ रुपये बैठती है। बोली इससे कहीं अधिक जाने की भी संभावना जताई जा रही है। शहर के अत्यंत व्यस्त और कीमती इलाके में स्थित राइफल क्लब मैदान वर्षों से खेल गतिविधियों का केंद्र रहा है।

बांदा विकास प्राधिकरण का पक्ष है कि यह भूमि 10 मार्च 1998 को फ्री होल्ड हो चुकी है और प्राधिकरण के नाम दर्ज है। यह भूमि नजूल आराजी संख्या 9546 में दर्ज है, जिसका कुल क्षेत्रफल 8825.70 वर्ग मीटर है। प्राधिकरण द्वारा प्रस्तुत योजना के अनुसार 1350 वर्ग मीटर में प्रस्तावित आवासीय भवन, 2000 वर्ग मीटर में प्रस्तावित शॉपिंग / कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स और 4482.50 वर्ग मीटर क्षेत्र में चिल्ड्रन पार्क, प्ले ग्राउंड और सुलभ शौचालय। इसी आधार पर विकास प्राधिकरण सचिव ने जिलाधिकारी को पत्र भेजकर मैदान बचाने की मांग से जुड़ी खबरों का खंडन किया है और इसे नियोजन के अनुरूप बताया है।

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या भाजपा जिलाध्यक्ष कल्लू सिंह की राइफल क्लब बचाने की घोषणा केवल राजनीतिक बयानबाजी थी ? या फिर पार्टी और प्रशासनिक निर्णयों के सामने वे खुद को असहाय पा रहे हैं? जनता के बीच यह चर्चा आम है कि यदि मैदान नहीं बचा तो इसका सीधा राजनीतिक नुकसान भाजपा को उठाना पड़ सकता है।
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