- विनोद मिश्रा
बांदा। किसान का “अन्न भंडार कुबेर का खजाना” कैसे बन जाये। उसकी आय कैसे बढ़े, इसके लिए कई प्रयास बेमानी साबित हो रहे हैं। अधिकारी सिर्फ जेबें भर रहें है। भ्रष्टाचार का धमाल है। इनमें ही एक है खेत-तालाब योजना। उद्देश्य तालाबों में जल संरक्षण की क्षमता बढ़े। सिचाई के लिए जल मिले। क्षेत्र का जलस्तर भी बेहतर हो जाए। पिछले सालों की बात करें तो आंकड़ों में करीब 16 सौ ज्यादा तालाब खोदे गए, हालांकि देखरेख व सफाई नहीं होने से बहुत से कहां गुम हो गए, यह पता नहीं चलता है। जिस मकसद से खोदे गए, उसका लाभ अन्नदाता को नहीं मिला।

बुंदेलखंड की सबसे बड़ी समस्या सूखा व सिचाई है। यहां खेत-तालाब योजना को सरकार ने विशेष महत्व दिया। वर्ष 2016-17 में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना से खेतों में तालाबों की खोदाई शुरू हुई। पहले साल बांदा व चित्रकूट में ढाई-ढाई सौ तालाब खोदे गए। दूसरे साल 2017-18 में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना व प्रधानमंत्री कृषि सिचाई योजना से तालाब खोदे गए। आरकेवाई से बांदा में 327 चित्रकूट में 285, पीएमकेएसवाई से 225 व 275 तालाब खोदे गए। इस साल से खेत-तालाब की खोदाई पीएमकेएसवाई से होने लगी।

विभागीय आंकड़ों को देखें तो विगत वर्षों में सैकड़ों तालाब बांदा व चित्रकूट जिले में खोद दिए गए हैं। इतने तालाबों के बावजूद किसानों को जरूरत के समय सिचाई के लिए भटकना पड़ता है। बहुत से तालाबों का तो पता ही नहीं है। विभागीय अधिकारी भले ही दावा कर रहे हों कि इन खेत-तालाबों से सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सिचाई व भूजल स्तर बचाने में मदद मिल रही है। लेकिन इनमें कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां अफसरों के यह दावे हवा-हवाई हैं। मसलन तालाब गुम हो गए या फिर सूखे पड़े हैं।



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