- विनोद मिश्रा
बांदा। जिले के पूर्व विधायक सपा नेता बृजेश प्रजापति नें रामचरित मानस की एक चौपाई का विरोध कर रामचरित मानस पर वैन लगानें तक की मांग की है। इसकी जमकर तार्किक आलोचना हो रहीं है। चौपाई यह है “पूजहि विप्र सकल गुण हीना। शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा” ! इस चौपाई के के माध्यम से सवाल उठाया है कि क्या तुलसीदास जी के इस कथन से सहमत हुआ जा सकता है ? क्या तुलसीदास जी ब्राह्मण होने के कारण जातपात और छुआछूत के समर्थक हैं ?

दरअसल बृजेश प्रजापति जो भाजपा में रहकर “रामनाम के गुणगान से विधायक हुये” वह औऱ उनके आका स्वामी प्रसाद मौर्य बहुत अज्ञानी हैं ! वह कैसे मैं बताता हूँ ! दरअसल हम चीजो को उसके “शब्दो के आधार” पर समझते हैं। इसलिए हम उसका “असली भाव” नही पकड़ पाते ! यही कारण था कि पहले के सारे शास्त्र “गुरु परम्परा” से पढ़ाये जाते थे, वर्ना आप “क्या का क्या अर्थ” निकाल लेगे ?

विवादित बनाई जा रहीं चौपाई में “विप्र का अर्थ आत्मज्ञानी व्यक्ति से है” जिसको “आत्मा का बोध” हो चुका है। जो “शरीर बोध” से ऊपर उठ चुका है। ऐसा व्यक्ति अगर “बाहरी रूप से “मूर्ख जड़ सब गुणों से हीन” भी दिखाई दे तो उसे “पूजना चाहिए” ! जैसे हमारे यहाँ अच्छे अच्छे संतो में कुछ ऐसे हुए जो बाहरी रूप से विचित्र और जड़ मालूम पड़ते रहे। जैसे रामकृष्ण परम् हंसः को जब समाधि लगे तो वो बेहोश हो के गिर जाते थे। उनके मुख से झाग आने लगे लोग समझे उन्हें मिर्गी का दौरा है, या वो पागल है । इसी प्रकार से “जड़ भरत” नाम के प्राचीन संत है।

उन्हें नाम ही “जड़” दे दिया गया, क्योकि वो बाहरी रूप से “जड़” मालूम पड़े। आशय यह कि कभी कभी ज्ञानी जन भी बाहरी आवरण से ऐसे मालूम हो सकते है ! “शुद्र वेद प्रवीणा का अर्थ हुआ” ऐसा व्यक्ति जो सारी किताबे पढ़ पढ़ के “प्रवचन बांचता” रहता है पर “उसका मर्म नही समझता है” ! उसको उसका “अनुभव ज्ञान नही है” फिर भी वो उसका “दम्भ करता है” पांडित्य दिखाता रहता है ! जैसे कबीर कहते है कि “मैं कहता आंखन देखी तू कहता कागज की लेखी”। यानी मैं अपने अनुभव से बोलता हूं, तू सिर्फ किताबो का लिखा बांचता है ।

यह भी समझिये कि “वर्ण व्यवस्था” पहले जो थी वो अलग थी। “वर्ण का अर्थ होता है रंग”। हम सामान्य बोल चाल की भाषा मे कहते भी है इसके “रंग” तो देखो “यानी भाव” तो देखो । पहले की जो “वर्ण व्यवस्था थी वो भाव आधारित थी”। इस संदर्भ में और बहुत से उदाहरण है जहाँ एक “वर्ण” से दूसरे “वर्ण” में लोग गए है । जैसे विश्वमित्र, सूत ऋषि इत्यादि । इसी प्रकार बहुत से सूत्रों के अर्थ गलत निकले गए है ! इसलिये “शब्द” न पकड कर उसके वास्तविक “सारगर्भित भाव” को पकड़ना चाहिये।



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