- विनोद मिश्रा
बांदा। मंडल में मनरेगा व्यवस्था का बहुत ही कष्ट महसूस कराने वाला दुखदाई व्याख्यान की स्थिति है। पूरी स्थिति जानकर मन तार तार हो जार -जार आंसू बहानें लगता है। हालत यह है कि दिलोजान से करा लिया काम और भुगतान मे ठन- ठन गोपाल। कर ली गई “जै राम जी की”।

यह दुर्भाग्य पूर्ण गाथा है मनरेगा योजना क। मंडल के 10 हजार से अधिक श्रमिकों का 60 लाख से अधिक का भुगतान अटका है। निर्माण सामग्री की करीब 42 की लाख की उधारी पड़ी कहावत चरितार्थ कर रही है की “उधार प्रेम की कैंची है”। हालात यह हैं की दो सौ ग्राम पंचायतों में कच्चे- पक्के काम ठप हो गए हैं। मजदूरी न मिलने से लगभग 25 हजार श्रमिक मनरेगा के फावड़ों से बेगाने है। मनरेगा का व्यथित पुराण भी समझिये। कोरोना में महानगरों से लौटे करीब 50 हजार से अधिक प्रवासी मजदूरों को मनरेगा से रोजगार मिला था। विभिन्न काम कराए गए।

कोरोना थमने पर 15 हजार से अधिक मजदूर फिर महानगरों को चले गए। मार्च माह में मंडल के चारों जनपदों में 35 हजार मजदूर काम कर रहे थे।उन्हें भुगतान नहीं मिला।करीब 60 लाख बकाया है। दूसरी तरफ निर्माण सामग्री की करीब 42 लाख उधारी है। ऐसे में निर्माण कार्यों में ब्रेक है। मजदूरों की संख्या घटती जा रही है। मौजूदा में मात्र 10 हजार रह गई।मंडल के 160 ग्राम पंचायतों में काम बंद हैं। बांदा की 469 में 55, हमीरपुर की 330 में 35, चित्रकूट की 331 में 40, महोबा की 273 में 30 ग्राम पंचायतें ऐसी हैं जहां पर कार्य पूर्ण ठप है।
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