- विनोद मिश्रा
बांदा। देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की चिंगारी इतिहासके पन्नों में मेरठ(उत्तर प्रदेश) से भड़की हुई दर्ज है,लेकिन इतिहास के पन्नों में उसी इतिहास के झरोखे में गहराई से झांकने पर पता चलता है कि स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल 1857 से 15 साल पहले 1842 में बुंदेलखण्ड की धरती पर फूंका गया था। लेकिन क्रांति से सम्बंधित इतिहास के सुनहरे पन्नों पर बुंदेलों की ये वीर गाथा अपना स्थान न बना सकी और गुमनामी के तहखाने में बंद हो गई। अलबत्ता अंग्रेजों ने इन क्रांतियों का उल्लेख बुंदेलखण्ड के कई गजेटियरों में किया है।

-बुंदेली धरती से हुआ क्रांति का सूत्रपात
फिरंगियों के खिलाफ क्रांति का सूत्रपात सन् 1842 में ही बुंदेलखण्ड की धरती पर हो गया था। इस क्रांति को बुंदेलखण्ड विद्रोह, बुंदेला विद्रोह के नाम से जाना जाता है।

दुर्भाग्य कि आजादी की मशाल जलाने वाले बुंदेली रणबांकुरे इतिहास की काल कोठरी में दफन हो गए। बुंदेलों के इस संग्राम में बुंदेला ठाकुरों के साथ साथ लोधी और गौड़ जाति के राजा जागीरदारों व् जमीदारों की भी भूमिका महत्वपूर्ण थी। बुंदेली इतिहास के आईने को साफ करने पर पता चलता है कि मधुकर शाह बुंदेला, जवाहर सिंह बुंदेला, अमर सिंह महतो जैसे बुंदेली जागीरदारों व् जमीदारों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया था।
– जनता की अदालत में फिरंगियों को फांसी
विद्रोह के दौरान 6 जून 1842 को बुंदेलखण्ड के चित्रकूट जनपद की मऊ तहसील में 5 फिरंगियों को फांसी पर लटका दिया गया था। बताया जाता है कि अंग्रेजों द्वारा चित्रकूट में गोकशी को लेकर विद्रोह की ये चिंगारी भड़की थी। उस समय जनपद में मराठा शासकों का राज था लेकिन बर्तानियां हुकूमत के आगे वे भी गोकशी के खिलाफ विरोध नहीं कर पा रहे थे। दिनों दिन जनता में इस बात को लेकर विद्रोह की चिंगारी आग का रूप ले रही थी। बुंदेलों ने एक दूसरे को एकत्र करते हुए जनजागरूकता फैलाई और 6 जून 1842 को मऊ तहसील को घेरते हुए अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया और अदालत लगाते हुए 5 फिरंगियों को फांसी दे दी गई। तत्कालीन बांदा गजेटियर 1842 में इस घटना का उल्लेख मिलता है। क्रांति की चिंगारी लपटें बनकर आस पास के इलाकों में भी फ़ैल गईं और बांदा का बबेरू बाजार भी अंग्रेजों से क्रांतिकारियों ने आजाद करा लिया। उसके बाद तिंदवारी तहसील में भी बुंदेली क्रांतिवीरों ने कब्जा करते हुए सरकारी अभिलेख जला दिए। 15 जून 1842 को क्रांतिकारियों ने बांदा में फिरंगी अफसर काकरेल की हत्या कर अंग्रेजों में क्रांति के प्रति खौफ कायम करने का प्रयास किया और युद्ध परिषद का गठन कर बुंदेलखण्ड को आजाद घोषित कर दिया गया।

– कुचल दिया गया आंदोलन
इन सबके बावजूद क्रांतिकारियों का कोई ठोस नेतृत्व न होने और छोटे बड़े रियासतों के राजाओं की गद्दारी के चलते अंग्रेजों ने बुंदेलखण्ड से भड़कने वाली विद्रोह की इस चिंगारी को बुझा दिया और आंदोलन को कुचल दिया गया. अंग्रेजों ने क्रांति के दौरान अपनी सहायता के लिए बांदा के नवाब से गुहार लगाई थी और पन्ना छतरपुर गौरिहार व् अजयगढ़ के राजाओ को आंदोलन को कुचलने के लिए तैयार किया था. हालांकि कुछ राजाओं के सैनिकों ने फिरंगियों के खिलाफ बुंदेलों के विद्रोह में उनकी सहायता भी की थी।

– ऐतिहासिक इमारतों को दिन लौटने का इंतजार
इन सबके इतर क्रांति की गवाही देती बुंदेलखण्ड की कई ऐतिहासिक इमारतों को दिन लौटने का इंतजार है। ऐतिहासिक अभिलेखों में दर्ज इन इमारतों की दीवारें स्वतंत्रता संग्राम की कहानियां बयां करती हैं लेकिन आज तक इनके उचित संरक्षण की व्यवस्था न हो पाई। आने वाली पीढ़ियों को इन ऐतिहासिक जगहों से काफी कुछ सन्देश मिल सकता है देश की आजादी के संघर्ष को लेकर लेकिन कोई संजीदगी न होने से ऐसी जगहें सिस्टम की अव्यवस्था का शिकार हो रही हैं। मानिकपुर में अंग्रेजों के समय का थाना मऊ कस्बे में स्थित पुरानी तहसील बांदा का दउवाका महल, भूरागढ किला आदि कई प्रमुख स्थान अपने हालात पर आंसू बहाते हुए आजादी की कहानी आज भी बयां कर रहे हैं।

( शरद मिश्रा- संपादक )
( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )



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