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खेत तालाब योजना 'ठप' : सरकारी 'दावों' की निकली 'हवा', किसानों का भरोसा 'डगमगाया'
उत्तर प्रदेश

खेत तालाब योजना ‘ठप’ : सरकारी ‘दावों’ की निकली ‘हवा’, किसानों का भरोसा ‘डगमगाया’

विनोद कुमार मिश्रा ( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )

  • विनोद मिश्रा

बांदा। सरकारी दावों और किसानों की ज़मीनी हकीकत में गहरी खाई है। कभी पानी बचाने और खेती को संजीवनी देने वाली ‘खेत तालाब योजना’ आज किसानों के लिए ‘बोझ’ बन चुकी है। वजह है ‘शासन की कटौती और तालाबों का सिकुड़ता आकार’। चित्रकूटधाम मंडल में किसानों को अब ‘यह योजना रास नहीं’ आ रही। ‘एरिया और धन’ दोनों में कटौती ने किसानों के उत्साह पर ऐसा पानी फेर दिया कि ‘योजना का हाल पतली डोर पर लटक’ गया है।

खेत तालाब योजना 'ठप' : सरकारी 'दावों' की निकली 'हवा', किसानों का भरोसा 'डगमगाया'

पिछले वित्तीय वर्ष 2024-25 में बांदा और चित्रकूट जिलों को 1440 छोटे तालाबों का लक्ष्य दिया गया था, मगर खुदाई हुई महज़ 800 तालाबों की। इस साल भी शासन ने दोनों जिलों को इतने ही तालाबों का लक्ष्य तो दिया है, लेकिन किसान अब पहले जैसे उत्साहित नहीं दिखते। भूमि संरक्षण विभाग के अनुसार, पहले खेत तालाब का आकार 35 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और तीन मीटर गहरा होता था। उस पर करीब 2.28 लाख रुपये की लागत आती थी। शासन किसानों को 50 प्रतिशत सब्सिडी देता था, जिससे किसान खुद तालाब खुदवाने को आसानी से तैयार हो जाते थे।

खेत तालाब योजना 'ठप' : सरकारी 'दावों' की निकली 'हवा', किसानों का भरोसा 'डगमगाया'

लेकिन अब सरकार ने तालाब का आकार आधा से भी कम कर दिया है। वर्तमान समय में तालाब बनाने की लागत घटाकर 1.05 लाख रुपये कर दी गई है। किसानों का कहना है कि, इतनी कम लागत में तालाब टिकाऊ नहीं बनता, न ही उसमें पर्याप्त पानी रुक पाता है। ‘खेत तालाब योजना’ के तहत चालू वित्तीय वर्ष में अब तक 300 किसानों ने आवेदन किए हैं। इनमें से भी कई किसान काम शुरू तो कर चुके हैं, मगर आधे मन से।

खेत तालाब योजना 'ठप' : सरकारी 'दावों' की निकली 'हवा', किसानों का भरोसा 'डगमगाया'

किसानों की दलील है कि छोटे तालाबों में न तो बारिश का पानी रुकता है, न ही सिंचाई की समस्या दूर होती है। किसानों का साफ कहना है कि जब महंगाई आसमान छू रही है, तब छोटे तालाबों में निवेश करना उनकी जेब पर भारी पड़ रहा है। उप कृषि निदेशक डॉ. अभय यादव कहना है कि सरकार की मंशा है “कम लागत में अधिक से अधिक किसानों को लाभ पहुंचाना।” लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि किसान छोटे तालाबों से संतुष्ट नहीं हैं।

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

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