- विनोद मिश्रा
बांदा। “बुंदेलखंड में चना बजने लगा है घना” लागत और मेहनत कम तथा बिकने और दाम मिलने पर रंग चोखा।इसलिये किसान को खेती में चने से मोहब्बत दूसरे जिंसों के मुकाबले ज्यादा हो गई है।

दरअसल अब किसान खेती में घाटा देख नफा-नुकसान के आधार पर परंपरागत खेती को नए रुख पर मोड़ रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में रबी और खरीफ की फसलों का आकलन यही बता रहा है। सबसे ज्यादा खपत वाली मुख्य फसल गेहूं की खेती में गिरावट आ रही है और इसके विपरीत चना चमक रहा है।

मौसम में साल-दर-साल आए बदलाव और दैवी आपदाओं की मार से खेती भी नया मोड़ ले रही है। कृषि विभाग के पिछले पांच सालों के आंकड़ों से यह बात सामने आई है कि मुख्य फसल गेहूं का दायरा सिमट रहा है। इसके विपरीत चने की खेती के प्रति रुझान बढ़ रहा है। कुछ चुनिंदा किसानों की दलील है कि चने के भाव ज्यादा मिलते हैं। इसकी खेती और कटाई आदि में झंझट कम है। गेहूं की खरीद ज्यादातर सरकारी केंद्रों में निर्धारित भाव पर होती है, जबकि चना खुले बाजार में ज्यादा दामों पर बिकता है।
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