
- विनोद मिश्रा
बांदा। ‘लल्ले गुरु’ के नाम से ‘मशहूर’ पूर्व पालिका अध्यक्ष मोहन साहू ने एक बार फिर ‘दल-बदल’ कर जिले की सियासत में ‘नैतिकता दरकिनार’ कर स्वार्थ पूर्ण राजनीति को ‘उड़ान’ दे दी है ? तीसरी बार दल बदलते हुए उन्होंने ‘कांग्रेस का दामन थाम’ लिया है। इसके साथ ही उन्होंने सांसद कृष्णा पटेल और उनके पति पूर्व मंत्री शिवशंकर सिंह पटेल के दल-बदल के ‘चर्चित कीर्तिमान’ की ‘बराबरी’ कर ली है।
मोहन साहू की सियासी पारी राष्ट्रीय लोकदल के जिलाध्यक्ष के रूप में शुरू हुई थी। वर्ष 2004 में राइफल क्लब मैदान में तत्कालीन सपा मुखिया की जनसभा हुई। सियासी हवा का ‘रुख भांपते’ हुए वे उसी मंच से ‘सपा में शामिल’ हो गए और सपा के ही सहारे पालिकाध्यक्ष की ‘कुर्सी हासिल’ कर ली।
सपा के ‘वरिष्ठ सूत्रों’ की मानें तो कुर्सी मिलते ही वे अपनी कथित ‘कारगुजारियों’ के कारण नेतृत्व की नजरों में गिर गए। उन्हें धीरे-धीरे हाशिए पर डाल दिया गया ! यहाँ तक कि पार्टी उन्हें छह साल के लिए निष्कासित करने की तैयारी में थी। निष्कासन की तलवार लटकती देख उन्होंने पहले ही ‘नया ठिकाना तलाश’ लिया।
अब वे कांग्रेस में शामिल होकर पंजे पर ‘कुर्बान’ होने की ‘बात’ कह रहे हैं। ‘राजनीतिक जानकारों’ का कहना है कि मोहन साहू के लिए दल विचारधारा नहीं, बल्कि सत्ता की सीढ़ी है ! हर बार वे दल बदलते हैं, कुर्सी पाते हैं और फिर नए दल की तलाश में निकल पड़ते हैं। देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस में उनकी यह कुर्बानी ‘कितने दिन’ टिकती है।
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