
- विनोद मिश्रा
बांदा। यूपी की ‘सियासत’ में जब-जब ‘साइकिल और हाथ’ साथ आए हैं, लखनऊ की ‘गद्दी हिली’ है। अब उसी पुरानी दोस्ती का नया और सबसे रोचक अवतार ‘बांदा और नरैनी’ में देखने को मिल सकता है। जिले में इन दिनों ‘चाय की दुकानों से लेकर दफ्तरों’ तक एक ही ‘चर्चा गरम’ है की प्रत्याशी सपा का, चुनाव चिन्ह कांग्रेस का।
यानी ‘पोस्टर पर चेहरा समाजवादी’ होगा, अंदाज साइकिल वाला होगा, पर ‘बटन दबेगा पंजे’ पर। सुनने में यह ‘अटपटा’ लगता है, पर इसके ‘पीछे गठबंधन का बड़ा गणित छिपा’ है। गणित समझिए ‘बांदा और नरैनी’ में भाजपा को हराने के लिए सपा को ‘सवर्ण और दलित वोट’ चाहिए, जो उसके पास नहीं है। कांग्रेस को जमीन पर लड़ने वाला ‘दबंग प्रत्याशी’ चाहिए, जो उसके पास नहीं है। तो ‘दोनों ने जुगाड़ निकाला – तुम चेहरा दो, हम निशान’ देते हैं।
इस ‘फॉर्मूले’ से ‘सपा’ अपने ‘कोर वोटर’ को तो ‘बांधे’ रखेगी ही, कांग्रेस के ‘परंपरागत वोटर’ को भी यह कहकर मना लेगी कि ‘निशान’ तो अपना ही है। ‘एक तीर से दो निशान’। अब विचारणीय यह है कि कार्यकर्ता क्या करेगा ? सपाई हाथ का प्रचार कैसे करेगा और कांग्रेसी साइकिल वाले के लिए नारा कैसे लगाएगा ? यही ‘उलझन’ इस खबर को और भी ‘रोचक’ बना रही है। बहरहाल, ‘आधिकारिक मुहर’ लगनी बाकी है, पर इतना तय है कि अगर यह ‘फॉर्मूला जमीन पर उतरा’ तो बांदा की ‘चुनावी लड़ाई’ सिर्फ ‘प्रत्याशियों’ की नहीं, बल्कि ‘चुनाव चिन्हों के कन्फ्यूजन’ की भी होगी।
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