
- विनोद मिश्रा
बांदा। खेतों में “पसीना बहाकर” देश का “पेट”भरने वाला “अन्नदाता आज अपने ही हक” के लिए “भटक” रहा है। इसकी “सबसे बड़ी वजह” बन गई है सरकारी “फार्मर रजिस्ट्री” की “जटिल व्यवस्था”। हालात इतने “विस्फोटक” हो चुके हैं कि “करीब एक लाख किसान” समर्थन मूल्य पर अपना गेहूं बेचने से “बाहर” हो गए हैं, जिससे “पूरा सिस्टम” कटघरे में हैं!

सरकार के सख्त नियमों के तहत अब गेहूं बेचने के लिए केवल पंजीकरण नहीं,बल्कि फार्मर रजिस्ट्री भी अनिवार्य कर दी गई है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि हजारों किसान कागजी गड़बड़ियों के जाल में ऐसे फंसे हैं कि चाहकर भी यह प्रक्रिया पूरी नहीं कर पा रहे। नतीजा क्रय केंद्रों से उनका गेहूं सीधे लौटा दिया जा रहा है। वह बेबस होकर प्राइवेट मंडियों की ओर रुख कर रहे हैं।

आंकड़े इस ‘कृषि संकट’ की असली तस्वीर दिखाते हैं। जिले में 3 लाख से ज्यादा किसान पंजीकृत हैं,जिनमें से 2,88,099 किसान पीएम सम्मान निधि से जुड़े हैं, लेकिन सिर्फ1,92,554 किसानों की ही फार्मर रजिस्ट्री पूरी हो पाई है। यानी 95,545 किसान सिस्टम से बाहर और एमएसपी उनके लिए सिर्फ कागजी वादा बनकर रह गया है।

इसका सीधा फायदा आढ़तियों को मिल रहा है, जहां किसान घाटे में और बिचौलिये मुनाफे में हैं। इस पूरे संकट की जड़ खतौनी और आधार कार्ड में नाम का अंतर है। कहीं नाम की स्पेलिंग अलग है, तो कहीं जाति का उल्लेख अलग और यही तकनीकी खामियां किसानों के लिए सबसे बड़ा संकट बन गई हैं।
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