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October 10, 2026
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बांदा में 'मौत की नदी' फिर 'खिलखिलानें' को तैयार: प्रशासन की 'आंखों' पर 'चांदी' की पट्टी !
उत्तर प्रदेशबुंदेलखंड

बांदा में ‘मौत की नदी’ फिर ‘खिलखिलानें’ को तैयार: प्रशासन की ‘आंखों’ पर ‘चांदी’ की पट्टी !

विनोद मिश्रा डायरेक्टर सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • विनोद मिश्रा

बांदा। जिले में “मौत की नदी फिर खिलखिलाने” वाली है ! अक्टूबर के अंत में जैसे ही “केन और यमुना” का पानी उतरेगा, “नदी की छाती पर खोदे गए यम के गड्ढे कुलांचे” भरने लगेंगे। हर साल की तरह इस साल भी “मासूमों की लाशें गिनी” जाएंगी, कफन बांधे जाएंगे,और प्रशासन “मगरमच्छी आंसू” बहाकर फिर सो जाएगा। यह “कोई प्राकृतिक हादसा नहीं, प्रशासनिक हत्या” है।बांदा में जल तांडव का बजा अलार्म: केन-यमुना का दिखा 'रौद्र' रूप, इलाकों में मची खलबलीपैलानी के खप्टिहा कलां, सांडी, खरेई, अमलोर, सादी मदनपुर की “मौरंग खदानों में मौत का जाल बुना” गया है। पट्टे की सीमा से बाहर, बीच धारा में “सक्शन मशीनें गरजीं”। नदी को 30 फीट तक खोखला कर दिया गया है। “तलहटी में बने यह गड्ढे पानी के भीतर दिखाई नहीं” देते।बालू 'अवैध खनन' में बांदा एवं हमीरपुर 'सिरमौर्य' : 'एनजीटी का चला 'चाबुक' !जो उतरा, वह डूबा। खप्टिहा और सांडी में अब तक “एक दर्जन जिंदगियां यह नदी निगल” चुकी है। नाव घाट तक नहीं छोड़े गए। जहां महिलाएं पानी भरती हैं,जहां बच्चे नहाते हैं, वहीं “मौत के गड्ढे खोद” दिए गए हैं। कोई चेतावनी बोर्ड नहीं, कोई बैरिकेडिंग नहीं, कोई भराव नहीं।बालू 'अवैध खनन' में बांदा एवं हमीरपुर 'सिरमौर्य' : 'एनजीटी का चला 'चाबुक' !प्रश्न यह है कि जब मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण तक पहुंच चुका है, तो खनन विभाग, प्रदूषण विभाग और जिला प्रशासन मौन क्यों है ? क्या हर मौत के पीछे चांदी के जूते की खनक है? क्या एक गरीब की जान की कीमत एक ट्रक मौरंग से भी सस्ती है? अगर इस बार भी गड्ढे नहीं भरे गए,तो समझ लीजिए “अगली लाश का जिम्मेदार खनन माफिया नहीं, वह जिम्मेदार अफसर होगें जिन्होंने आंखें मूंद” रखी हैं।

 
 



Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh
 





 

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