
- विनोद मिश्रा
बांदा। क्या आज़ादी के 79 साल बाद भी उत्तर प्रदेश के एक गांव के बच्चों को स्कूल जाने के लिए कीचड़ से जंग लड़नी पड़ेगी? क्या विकास के दावों के बीच एक किलोमीटर की सड़क आज भी ग्रामीणों के लिए सपना बनी रहेगी? और क्या प्रशासन तब जागेगा, जब किसी बच्चे की जान इस रास्ते पर चली जाएगी? यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि अतर्रा क्षेत्र के भूरा यादव का पुरवा के ग्रामीण बुधवार को अपने मासूम बच्चों के साथ जिला मुख्यालय पहुंच गए।
बच्चों के हाथों में किताबें नहीं, बल्कि तख्तियां थीं, जिन पर बड़े अक्षरों में लिखा था “सड़क नहीं, तो स्कूल नहीं !” यह सिर्फ एक नारा नहीं था, बल्कि उस गांव की पीड़ा थी, जहां बरसात आते ही सड़क की जगह दलदल दिखाई देता है और शिक्षा की राह कीचड़ में धंस जाती है।
ग्रामीणों के अनुसार अतर्रा केन-कैनाल कार्यालय से भूरा यादव का पुरवा तक करीब एक किलोमीटर का कच्चा मार्ग वर्षों से बदहाल है। बरसात होते ही यह रास्ता कीचड़ में बदल जाता है। पैदल चलना तक मुश्किल हो जाता है। सबसे अधिक मुश्किल उन स्कूली बच्चों को होती है, जिन्हें हर सुबह इसी रास्ते से होकर विद्यालय जाना पड़ता है। कई बार बच्चे फिसलते हैं, कपड़े और किताबें खराब हो जाती हैं और समय पर स्कूल पहुंचना भी संभव नहीं हो पाता।
ग्रामीणों ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर मांग की कि इस मार्ग पर तत्काल गिट्टी और मोरम डालकर सड़क को आवागमन योग्य बनाया जाए तथा स्थायी सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाए। ग्रामीणों ने यह भी कहा कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो वे आगे भी लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन जारी रखेंगे। सरकार शिक्षा, गांव और सड़क विकास पर लगातार जोर दे रही है। ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए अब भी कीचड़ से लड़ना पड़ेगा? क्या सिर्फ एक किलोमीटर सड़क के अभाव में गांव का भविष्य दांव पर लगा रहेगा?
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