
- विनोद मिश्रा
बांदा। “सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क” ! तिंदवारी कस्बे से गुजर रहे “राष्ट्रीय राजमार्ग 232 का यही हाल” है। बांदा-फतेहपुर-लखनऊ का यह “मुख्य मार्ग” अब “दसों का मार्ग” बन चुका है, लेकिन राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के “लापरवाह अफसरों की नींद नहीं टूट” रही।
बीते 15 दिनों का “आंकड़ा” ही “तंत्र के मुंह” पर “तमाचा” है। “एक दर्जन से ज्यादा दुर्घटनाएं, 50 से ज्यादा लोग घायल, कई जिंदगियां अपाहिज” होने की “कगार” पर। “रात के अंधेरे में गहरे गड्ढे” दिखाई नहीं देते और दोपहिया सवार सीधे “काल के मुंह में समा” जाता है। बड़े वाहन “पलट” रहे हैं, लेकिन “दफ्तरों में बैठे अफसरों को यह सब आंकड़ा” भर लगता है।
बारिश थमनें लगी है पर “गड्ढा” भरने के नाम पर एक “टोकरी गिट्टी तक नहीं डाली” गई। विचारणीय यह है कि प्राधिकरण आखिर किसका इंतजार कर रहा है? किसी बड़े दुर्घटना का? सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि यह की जिले के “सांसद, विधायक, जनप्रतिनिधि” रोज इसी “सड़क से गुजरते” हैं, ठंडी गाड़ियों में गड्ढों का एहसास नहीं होता, इसलिए “सैकड़ों आम लोगों की चीखें उन्हें सुनाई नहीं” देतीं।
प्रशासन “मौन है, जिम्मेदार बेपरवाह” हैं और जनता “अपनी जान हथेली” पर लेकर इस मार्ग से “गुजरने को मजबूर” है। अगर यही लापरवाही रही तो “वह दिन दूर नहीं जब इस मार्ग के गड्ढे किसी की जान ले” लेंगे और “जिम्मेदार सिर्फ जांच” के आदेश देकर “पल्ला झाड़” लेंगे।
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