
- विनोद मिश्रा
चित्रकूट। बुंदेलखंड के पाठा के “बीहड़ों का नाम” आते ही कभी बंदूकें, गोलियों की आवाज और डकैतों का “खौफ” याद आता था। इन्हीं बीहड़ों में एक ऐसा नाम पैदा हुआ, जिसने करीब तीन दशक तक उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की पुलिस को चुनौती दी ‘शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ’।
पुलिस रिकॉर्ड में वह हत्या, अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों का आरोपी कुख्यात दस्यु सरगना था, लेकिन उसके प्रभाव वाले इलाकों में कुछ लोग उसे “गरीबों और जरूरतमंदों” का “मददगार” भी मानते रहे। किसी के लिए खूंखार डकैत, तो किसी के लिए ‘रॉबिनहुड’ के अलावा विधायक एवं सांसद बनवा देना, ददुआ की सबसे बड़ी पहचान बन गई। यह “चुनावी नारा” भी “बुलंदियों” पर पहुंचा की, “मोहर लगेगी हाथी पर नहि तो गोली पड़ेगी छाती” पर ?
चित्रकूट के रैपुरा थाना क्षेत्र के देवकली गांव में जन्मे ददुआ ने “पिता की हत्या” के बाद “बदले की आग” में “हथियार” उठा लिया। बताया जाता है कि पिता के “हत्यारे जगन्नाथ समेत नौ लोगों की हत्या” के बाद वह “बीहड़ों की दुनिया में उतर” गया और देखते ही देखते पाठा क्षेत्र का “सबसे ताकतवर दस्यु सरगना” बन गया। वर्ष 1986 में रामू का पुरवा गांव में एक साथ “नौ लोगों की हत्या” ने उसके “आतंक को पूरे बुंदेलखंड में स्थापित” कर दिया।
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के अलग-अलग थानों में उसके खिलाफ 241 आपराधिक “मामले दर्ज” बताए गए। मुखबिरी के शक में की गई “हत्याओं और उसकी क्रूरता” के कारण उसे “बुंदेलखंड का वीरप्पन” कहा जाने लगा। ददुआ का प्रभाव चित्रकूट तक सीमित नहीं था। बांदा, फतेहपुर से लेकर सतना, पन्ना और छतरपुर तक उसके “नाम की चर्चा” होती थी। समय के साथ “उसका असर राजनीति” तक पहुंचा और उसके “परिवार के सदस्य भी सक्रिय राजनीति” में आए। भाई “बालकुमार पटेल और पुत्र वीर सिंह पटेल” ने चुनावी “राजनीति में अपनी पहचान” बनाई।
वर्ष 2007 में मायावती की सरकार बनने के बाद “ददुआ” के “सफाए का फैसला” लिया गया। मुख्यमंत्री के निर्देश पर एसटीएफ ने “विशेष अभियान” शुरू किया। 22 जुलाई 2007 की सुबह “मुखबिर और सर्विलांस से सूचना” मिली कि ददुआ मानिकपुर क्षेत्र के “आल्हा-झलमल” के जंगलों में मौजूद है। एसटीएफ टीम ने जंगल में अपनी पोजीशन ली। ऑपरेशन की कमान “एसएसपी अमिताभ यश और एएसपी अनंत देव” संभाल रहे थे।
सुबह करीब 9:15 बजे एसटीएफ और ददुआ गिरोह के बीच भीषण गोलीबारी में एसटीएफ ने “कुख्यात दस्यु सरगना शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ” को उसके “पांच साथियों” के साथ “मार” गिराया। ददुआ पर करीब साढ़े पांच लाख रुपये का “इनाम” घोषित था।
उसकी मौत के साथ बुंदेलखंड के बीहड़ों के “एक लंबे और खूनी अध्याय का अंत” हो गया। आज “ददुआ” इतिहास का हिस्सा है, लेकिन “पाठा के बीहड़ों” में उसका “नाम अब भी चर्चाओं” में आता है। जिस ददुआ के नाम से कभी बुंदेलखंड कांपता था, उसी “बीहड़ों में एक दिन गोलियों की गूंज” के साथ उसके “आतंक का अंत” हो गया।
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