
- शरद मिश्रा
बांदा। रविवार की सुबह “भुजरख गांव में सूरज तो निकला, पर अंशु वर्मा के घर में हमेशा के लिए अंधेरा” कर गया। उन्नीस साल के अंशु से पिता का साया तो पहले ही सिर से उठ चुका था। स्वर्गीय नंदकिशोर वर्मा का बेटा अब “घर का इकलौता सहारा” था। रविवार सुबह वह रोज की तरह “मजदूरी करने महुई गांव के लिए निकला” था। “मां ने सोचा होगा शाम को बेटा लौटेगा, दो रोटी कमाकर” लाएगा। पर किसे पता था कि यह उसकी आखिरी सुबह है।
देहात कोतवाली क्षेत्र में “मौत बनकर आए एक “तेज रफ्तार लोडर” ने अंशु को रौंद” दिया। टक्कर इतनी “दर्दनाक” थी कि मासूम “सड़क” पर “तड़पता” रह गया। राहगीरों ने दौड़कर पुलिस को बुलाया, पुलिस ने उसे गोद में “उठाकर अस्पताल” पहुंचाया, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने सिर हिलाते हुए कहा ‘अब कुछ नहीं बचा’। और उधर भुजरख में जैसे ही खबर पहुंची, मां की चीखों से आसमान कांप उठा। “मेरा अंशु मेरा अंशु” कहकर वह “जमीन पर गिर” पड़ी।
जिस बेटे को उसने पाला था, “जो पिता के जाने के बाद उसका “बुढ़ापे” का “सहारा” बना था, वो एक लापरवाह लोडर की भेंट चढ़” गया। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है, लोडर चालक फरार है। पर सवाल यह है कि इन तेज रफ्तार “मौतों” का “सिलसिला” कब रुकेगा ? आज अंशु गया है, कल कोई और होगा। एक और “गरीब घर का चिराग बुझ” गया, और “सिस्टम हमेशा की तरह पंचनामा” भर रहा है।
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