
- शरद मिश्रा
बांदा। अतर्रा रेलवे ओवरब्रिज का “निर्माण” आम जनता के लिए “जी का जंजाल” बन गया है। निर्माण के लिए बनाए गए “दोनों वैकल्पिक बाईपास मार्ग” आज खुद हादसों के सबसे “बड़े कारण” बन गए हैं। गड्ढों, कीचड़ और जलभराव से बजबजाते इन रास्तों पर हर दिन कोई न कोई गिरकर “घायल” हो रहा है, लेकिन “जिम्मेदार महकमा कुंभकर्णी नींद में सोया” है।
अतर्रा-ओरन रोड को जोड़ने वाला “बाईपास जो मंडी समिति के बगल से निकाला” गया था, अब “सड़क कम और तालाब ज्यादा नजर” आता है। पूरी सड़क पर एक फीट तक के “गड्ढे और घुटनों तक कीचड़” भरा है। दो पहिया वाहन तो दूर, पैदल निकलना भी “जान जोखिम” में डालने जैसा है।
वहीं दूसरा बाईपास जो हिंदू इंटर कॉलेज के मैदान के पीछे से नहर पटरी होते हुए बिसंडा रोड जाता है, उसकी हालत और भी दयनीय है। बरसात के बाद से यहां कोई “मरम्मत” नहीं हुई। पूरे “रास्ते में पानी भरा” है और सड़क कहीं नजर ही नहीं आती। स्थानीय दुकानदारों, छात्रों और मरीजों का कहना है कि इस “बदहाली के कारण रोजाना एक्सीडेंट” हो रहे हैं।
वाहन “फंसने से घंटों जाम” लगा रहता है। कई बार “एंबुलेंस तक फंस” चुकी है। ग्रामीणों की शिकायत पर जब अतर्रा एसडीएम से वार्ता की गई तो उन्होंने केवल आश्वासन की “घुट्टी पिलाते” हुए कहा कि जल्द ही निरीक्षण कर कार्य देखा जाएगा। प्रश्न यह है कि आखिर यह “जल्द” कब आएगा ? क्या किसी “बड़ी जनहानि के बाद ही प्रशासन की नींद” खुलेगी?
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