- विनोद मिश्रा
बांदा। मुख्य मंत्री जी बाखबर है लेकिन उनको खबर बता दें कि बांदा जिले में खनिज नियम और बालू खदानों में जमीन-आसमान का अंतर है। नियम कुछ है और खदानों में चल रहा कुछ और है। अधिनियम के तहत हैवी पोकलैंड मशीनों से खनन की अनुमति नहीं है। पर ऐसा हो रहा है !

ईएमएम-11 (रवन्ना) पट्टाधारक खुद आनलाइन बनाते हैं। यह नियम और खदानों में हो रहे खनन में अंतर है। अधिकांश खदानों में रॉयल्टी दर, पट्टाधारक का नाम, क्षेत्रफल, गाटा संख्या, खदान का नाम संबंधी बोर्ड में रायल्टी दर नहीं लिखी गई हैं।

इसके अलावा हैवी पोकलैंड मशीनों से अंधाधुंध बालू निकाली जा रही है। यहां तक कि नदियों की जलधारा में मशीनें उतारकर पानी की सतह से बालू का खनन हो रहा है। रवन्नों में वाहन संख्या और समय में छेड़छाड कर बालू ढोई जाती है।

खनिज परिहार्य नियमावली के 47वें संशोधन 2019 के मुताबिक पट्टाधारक नदी की जलधारा अथवा जहां पानी कम हो वहां मशीन से खनन नहीं कर सकता। साथ ही नदी में तीन मीटर की गहराई तक ही खनन किया जा सकता है।

इसका उल्लंघन करने पर पांच लाख रुपये की दर से जुर्माना वसूलने का प्राविधान है। कहा कि खदान संचालक ज्यादातर एमएम प्रपत्र-एक माइनिंग प्लान में जमा ही नहीं करते। सीमांकन से अधिक उत्खनन हो रहा हैं। मशीनों से खनन और लोडिंग के चलते स्थानीय मजदूरों को काम नहीं मिलता। रोक के बावजूद सूर्यास्त बाद भी खनन का कार्य जारी रहता हैं। बांदा की जीवन रेखा केन नदी का अस्तित्व समाप्त की और है।
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