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October 9, 2026
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गांवों में गंदगी की सरकार: करोड़ों खर्च, कागजों में चमक रही योजना, अफसरों की शह पर खेल ?
उत्तर प्रदेशबुंदेलखंड

गांवों में गंदगी की सरकार: करोड़ों खर्च, कागजों में चमक रही योजना, अफसरों की शह पर खेल ?

विनोद मिश्रा डायरेक्टर सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • विनोद मिश्रा

बांदा। स्वच्छ भारत मिशन के नाम पर ‘गांवों को चमकाने’ के ‘दावे’ किए जा रहे हैं, लेकिन बबेरू ब्लॉक की ‘जमीनी तस्वीर’ इन ‘दावों की परतें’ खोलती नजर आ रही है। हर महीने 25 लाख रुपये से ज्यादा सरकारी पैसा सफाई कर्मचारियों के वेतन पर खर्च हो रहा है, 75 कर्मचारी तैनात हैं, लेकिन ‘गांवों की गलियों’ में ‘गंदगी का साम्राज्य’ कायम है। नालियां ‘बजबजा’ रही हैं, रास्तों पर ‘कूड़े के ढेर’ हैं और ग्रामीण सवाल पूछ रहे हैं जब सफाई के नाम पर लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं तो आखिर सफाई गई कहां ?अठ्ठाइस करोड़ में बिक गई "स्वच्छता": गांवों में सड़ांध और फाइलों में सफाई !जिम्मेदार बेखबर !विकासखंड बबेरू की 61 ग्राम पंचायतों और 18 राजस्व गांवों, यानी कुल 79 गांवों के लिए 75 सफाई कर्मचारी तैनात बताए गए हैं। इनमें 14 महिला कर्मचारी भी शामिल हैं। इन कर्मचारियों पर हर महीने करीब 25 लाख 4 हजार 25 रुपये खर्च होने की बात सामने आई है। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि इतनी बड़ी फौज होने के बावजूद गांवों में ‘सफाई व्यवस्था बदहाल’ है। ‘नालियां बजबजा’ रही हैं, गलियों में ‘कूड़ा जमा’ है और ग्रामीण गंदगी के बीच रहने को ‘मजबूर’ हैं।अठ्ठाइस करोड़ में बिक गई "स्वच्छता": गांवों में सड़ांध और फाइलों में सफाई !जिम्मेदार बेखबर !यही वह सवाल है जो अब पूरे मामले की ‘सबसे बड़ी जांच मांग’ रहा है। ‘सरकारी व्यवस्था’ के अनुसार सफाई कर्मचारियों की तैनाती गांवों को साफ रखने के लिए की गई है। लेकिन यदि ग्रामीणों के आरोप सही हैं और कर्मचारी नियमित रूप से गांवों में नहीं पहुंच रहे, तो हर महीने खर्च हो रही लाखों रुपये की रकम का ‘वास्तविक परिणाम” आखिर दिखाई क्यों नहीं दे रहा ? क्या सिर्फ रजिस्टर में ‘हाजिरी’ लगाकर ‘सरकारी वेतन’ लिया जा रहा है?अठ्ठाइस करोड़ में बिक गई "स्वच्छता": गांवों में सड़ांध और फाइलों में सफाई !जिम्मेदार बेखबर !क्या अधिकारियों की ‘निगरानी व्यवस्था’ फेल है? या फिर इस पूरी व्यवस्था के पीछे कोई ‘बड़ा खेल’ चल रहा है? चार हजार से अधिक आबादी वाले ग्राम पंचायत पंडरी के ग्रामीणों का आरोप है कि उनके यहां ‘सफाई कर्मी नियमित रूप’ से नहीं आते। गांव में ‘कूड़ा-कचरा’ जमा होने से ‘रास्तों और गलियों’ की स्थिति ‘खराब’ होती जा रही है। अब सवाल यह है कि चार हजार से ज्यादा लोगों वाले गांव में सफाई व्यवस्था बदहाल होने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है ? स्वच्छ भारत के ‘दावों और गांवों’ की ‘जमीनी हकीकत’ के बीच कितना ‘बड़ा अंतर’ है अब इस सवाल का जवाब प्रशासन को देना होगा।

 
 



Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh
 





 

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