
- विनोद मिश्रा
चित्रकूट। जब राजनीति, कूटनीति और अर्थनीति फेल हो जाए,तब “अध्यात्म नीति ही आखिरी रास्ता बचता है।” इसी भाव के साथ तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य 25 जून को एकांतवास पर चलें गये। राष्ट्र की विकट समस्याओं का आध्यात्मिक समाधान खोजने के लिए वह अगले 13 जनवरी तक सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह कट जाएंगे। 14 जनवरी को एकांतवासवास तपस्या खत्म कर दर्शन देंगे। अपने वीडियो संदेश में जगद्गुरु ने साफ कहा कि राष्ट्र इस समय कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। हालांकि उन्होंने नाम नहीं लिया, लेकिन उनके इशारे साफ हैं। सीमा पर तनाव,भीतर सामाजिक वैमनस्य, युवाओं में बढ़ता अवसाद, प्राकृतिक आपदाएं और नैतिक मूल्यों का क्षरण आदि। रामभद्राचार्य मानते हैं कि जब भौतिक प्रयास थक जाएं तो आध्यात्मिक ऊर्जा ही राष्ट्र को दिशा देती है। एकांतवास उनकी इसी ‘तप कूटनीति’ का हिस्सा है।
जगद्गुरु ने खासतौर पर चित्रकूट की महिमा का उल्लेख किया। संदेश देने की कोशिश किया की जहां राम ने मर्यादा स्थापित की, वहीं से आज राष्ट्र की मर्यादा बहाली के संकल्प के साथ चित्रकूट को केंद्र बनाकर वह पूरे देश की चेतना को जगाना चाहते हैं। इसलिए आमजन से हनुमान चालीसा और सुंदरकांड पाठ की अपील की। संकट मोचन ही संकट काटेंगे। उन्होंने मकर संक्रांति तक का समय लिया है। शास्त्रों में यह अवधि सूर्य के उत्तरायण होने की है। देवताओं का दिन शुरू होता है। जगद्गुरु का मानना है कि यह कालखंड तप और संकल्प सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ है। 6 महीने से ज्यादा का यह एकांतवास केवल निजी साधना नहीं,’राष्ट्र यज्ञ’ है। इस दौरान न कोई प्रवचन,न वीडियो,न भेंट। पूरी ऊर्जा राष्ट्र कल्याण के संकल्प पर केंद्रित रहेगी।
जगद्गुरु ने खुद को एकांत में बंद कर जनता को काम सौंप दिया। हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ। यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, सामूहिक सकारात्मक ऊर्जा का आह्वान है। जब लाखों लोग एक समय पर एक ही प्रार्थना करेंगे,तो वह ‘राष्ट्र कवच’ बनेगी। यह है अध्यात्म और व्यावहारिकता का समिश्रण है। मकर संक्रांति पर जब जगद्गुरु प्रकट होंगे, तब तक देश एक बड़े आध्यात्मिक अनुष्ठान से गुजर चुका होगा। उनके अनुयायी मानते हैं कि इस तप का परिणाम राष्ट्र के लिए शुभ संकेत लेकर आएगा। रामभद्राचार्य का यह एकांतवास केवल संत की निजी साधना नहीं है। यह उस भारत की बेचैनी है जो भौतिक प्रगति के शिखर पर पहुंचकर भी आत्मिक शांति खोज रहा है। जब संकट बड़े हों, तो समाधान भी बड़ा चाहिए। जगद्गुरु का तप उसी बड़े समाधान की तलाश है!
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