
- विनोद मिश्रा
बांदा। जिस “बुंदेलखंड की ग्रेनाइट की चट्टानी धरती को भू-वैज्ञानिक सबसे सुरक्षित” मानते थे, उसी “धरती के कदम अब डगमगा” रहे हैं। पिछले “दो दशकों में महसूस हुए भूकंप के झटकों ने यह साफ” कर दिया है कि “खतरा अब दरवाजे पर दस्तक” दे रहा है और इस “खतरे को बुलावा किसी और ने नहीं,बल्कि अंधाधुंध खनन” ने दिया है।
बुंदेलखंड में “पहाड़ अब पहाड़ नहीं” रहे। माफिया ने “कई पहाड़ों को जड़ से ही गायब” कर दिया है। जहां “कभी 100 फुट ऊंची चट्टानें थीं, वहां अब 100 फुट गहरे तालाब” बन गए हैं। पहाड़ की ऊंचाई के बराबर नीचे तक “खोदकर पाताली” पानी तक “निकाल” दिया गया है। यही हाल “केन, बेतवा जैसी जीवनदायिनी नदियों” का है, जिनकी “कोख को रोज छलनी” किया जा रहा है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू कॉलेज के भूगोल प्रवक्ता प्रो. अवधेश कुमार चेतावनी देते हैं कि “पहाड़ और चट्टानें” धरती के ब्रेकर हैं। वह भूगर्भीय प्लेटों को संतुलित रखते हैं। जब आप “पहाड़ को ही खत्म कर देंगे तो धरती की पकड़ ढीली” पड़ जाएगी। चित्रकूट मंडल की प्लेट भले ही ग्रेनाइट की है, लेकिन उसके “ऊपर के संतुलन को हम बिगाड़” चुके हैं। यह उसी तरह है जैसे “किसी इमारत की नींव तो मजबूत हो, लेकिन आप उसकी दीवारें ही तोड़” दें।
विशेषज्ञों के मुताबिक “यदि यही रफ्तार रही तो परिणाम भयावह” होंगे। न्यूनतम क्षति वाला यह क्षेत्र मध्यम और “फिर गंभीर भूकंप जोन में बदल” सकता है। “हल्का झटका भी बड़ी तबाही” ला सकता है क्योंकि “जमीन खोखली” हो चुकी है। पहाड़ खत्म होने से वर्षा जल का बहाव अनियंत्रित हो जाएगा। भूजल स्तर “पाताल” में चला जाएगा और “एक तरफ बाढ़ तो दूसरी तरफ भीषण सूखा बुंदेलखंड की नियति” बन जाएगा। साथ ही खोखली हो चुकी जमीन के अचानक धंसने की घटनाएं बढ़ेंगी। आज केन के किनारे जो गड्ढे दिख रहे हैं, वह सिर्फ “खनन के गड्ढे नहीं, बल्कि भविष्य की कब्रें हैं। “प्रशासन की खामोशी” इस “बारूद पर माचिस का काम’ कर रही है।
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