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October 13, 2026
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उत्तर प्रदेश

Banda : बांदा का मिनी पाठा, प्यास बुझाते हैं जंगली चोहड़ ! …

 

  • विनोद मिश्रा

बांदा। जिले में मिनी पाठा के रूप में बहुचर्चित फतेहगंज हैं।यह वह इलाका है, जहां घने जंगली इलाके नजर आते हैं, ऊंची पर्वत श्रंखला और पेड़ों की घनी छांव के बीच पथरीला इलाका। इसे लोग बीहड़ क्षेत्र भी कहते हैं। यहां के 75 परिवारों की प्यास बुझाते हैं चोहड़। इनका संरक्षण यहां के लोग खुद करते हैं। पत्थर के बीच पहाड़ों से रिसने वाला पानी ही इनका सहारा है। इनके लिए प्रकृति का यह वरदान है, जिसके यह लोग कद्रदान हैं।


फतेहगंज का यह इलाका घने जंगलों व ऊंची पर्वत श्रंखलाओं से घिरा हुआ है। यहां के बाशिदों को नीर के लिए प्रकृति का ऐसा वरदान मिला है जो प्राचीन समय से घने जंगलों के बीच रह रहे लोगों की प्यास बुझा रहा है। पहाड़ों की कोख से जगह-जगह स्त्रोत खुले हैं, जिन्हें इलाकाई भाषा में चोहड़ कहा जाता है। यदि यह चोहड़ बंद हो जाएं तो बीहड़वासी प्यासों मर जाएं। सदियों से यहां के लोग इन चोहड़ों का संरक्षण कर रहे हैं ताकि नीर की लकीर न टूटे और यूं ही जीवन की डोर प्रकृति के पानी से जुड़ी रहे। संरक्षण किए जाने की वजह से इनकी जीवन की डोर प्रकृति के पानी से जुड़ी नजर आती है।


उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश की सीमा पर बसा फतेहगंज का क्षेत्र पहाड़ियों से घिरा है। कुछ क्षेत्र में पथरीली जमीन होने के चलते भीषण गर्मी में पानी का संकट भी दिखाई पड़ता है। ऐसे क्षेत्र में प्रकृति ने भी छोटे बड़े आधा दर्जन स्त्रोतों से निकलने वाला पानी किसी वरदान से कम नहीं है। भीषण गर्मी में जब यहां से निकली पहाड़ी नदी कडैली सूखने की कगार पर आ जाती है। उस समय पहाड़ों की कोख से निकला पानी इकठ्ठा होता है, जो यहां के बाशिदों की प्यास बुझाने का काम करता है।


जंगल के बीच बसे ग्राम गोड़री-गोड़रामपुर में लगभग तीन सैकड़ा लोगों की आबादी निवास करती है। जिनकी आय का प्रमुख साधन बटाई में खेती किसानी या जंगली लकड़ियों को एकत्रित कर बाजार में बिक्री है। यहां दो-तीन सरकारी हैंडपंप भी लगे हुए हैं, लेकिन भीषण गर्मी में जलस्तर खिसकने के चलते इनकी प्यास चोहड़ से ही बुझती है।सत्तर के दशक में जब क्षेत्र में पानी संकट गहराया। उस समय पहाड़ियों के नीचे एकत्रित पानी (चोहड़) मिले। जिसे हमने सहेज लिया, जिनमें आज भी भीषण गर्मी में भी शीतल पानी उपलब्ध रहता है।


शुरुआती दौर में लोगों को पहाड़ों से निकलने वाला झरना मिला। जिस झरने के पानी को हम उपयोग करने लगे, लेकिन गर्मियों में झरने से पानी की धार धीमी होने पर इन्ही चोहड़ों के पानी से ही पेयजलापूर्ति होती है। यदि इन चोहड़ों को संरक्षित करने की दिशा में सरकार के नुमाइंदे भी पहल करें, तो क्षेत्र से जल संकट की समस्या से निजात मिल सकती है।

( शरद मिश्रा- संपादक )
( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )

 
 



Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh
 





 

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