
- विनोद मिश्रा
बांदा। इसे “लापरवाही कहें या बेशर्मी, बांदा के राजकीय मेडिकल कॉलेज” में इंसानियत “तार-तार” हो गई। जहां “डॉक्टर भगवान कहे जाते हैं, वहीं परिसर में गार्डों की नींद और अफसरों की अनदेखी” के चलते एक “आवारा कुत्ता मृत नवजात को मुंह में दबाकर ले गया और नोंचता” रहा।
बड़ोखर के दिनेश प्रजापति की पत्नी गुड़िया का प्रसव रात 11:30 बजे हुआ, बच्चा मृत पैदा हुआ। अस्पताल ने रात 12:30 बजे शव परिजन को थमा दिया और छुट्टी पा ली। “न कोई संवेदना, न रोकने की जगह,न सुबह तक की मदद”। “बेबस बाप लाश गोद में लेकर पूरी रात परिसर में भटकता” रहा। तड़के 2:30 से 3:30 के बीच “झपकी लगी तो कुत्ता आ धमका और बच्चे को उठा” ले गया।
जब “पिता की आंख खुली तो सामने रूह कंपा” देने वाला “मंजर” था। करोड़ों के बजट, सीसीटीवी और गार्डों के “दावे सब हवा-हवाई” निकले। मेडिकल कॉलेज “मरीजों का नहीं, आवारा जानवरों का अड्डा” बना हुआ है। दिन में “दलाल, रात में कुत्ते, यही है यहां की व्यवस्था”।
हद तो यह है कि प्रिंसिपल डॉ. सुनील कौशल को “घटना का पता ही नहीं”। उन्हें तो “यह भी नहीं मालूम कि उनके कॉलेज में रात में क्या होता” है ? बयान वही “घिसा-पिटा” जांच कराएंगे, कार्रवाई करेंगे। पर प्रश्न यह है की जिस “कॉलेज में मुर्दा तक महफूज नहीं, वहां जिंदा इंसान कैसे” बचेगा ?
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