
- विनोद मिश्रा
बांदा। तिंदवारी विधानसभा से पूर्व विधायक बृजेश प्रजापति “एक बार फिर चर्चा” में हैं। इस बार आरोप है कि उन्होंने “राजनीतिक स्वार्थ” के लिए अपने “राजनीतिक जनक” पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य को ही “निशाने” पर ले लिया है। “सूत्रों” के अनुसार वह अब “इंडिया गठबंधन” में जगह “तलाश” रहे हैं ?
कहानी 2017 से शुरू होती है। जब स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा छोड़कर भाजपा में आए, तो अपने करीबी के पुत्र बृजेश प्रजापति को भाजपा से तिंदवारी का “टिकट” दिला दिया। मोदी लहर में “अंधे के हाथ बटेर लगने” जैसी “जीत” मिल गई। लेकिन इसके बाद “बंदर के हाथ में उस्तरा वाली कहावत” चरितार्थ होने लगी। उन पर “भ्रष्टाचार और दबंगई के गंभीर आरोप” लगे !
2022 में स्वामी प्रसाद ने भाजपा छोड़ी तो बृजेश भी उनके साथ “भाजपा छोड़कर सपा में आ” गए। स्वामी प्रसाद ने उन्हें फिर तिंदवारी से सपा का टिकट दिलवाया, लेकिन इस बार जनता ने नकार दिया और चुनाव हार गए। “हार के बाद रिश्ते बिगड़ते” चले गए। स्वामी प्रसाद ने अपनी “नई पार्टी” राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी से “बृजेश को किनारे” कर दिया। इसके बाद से बृजेश “राजनीतिक रूप से अकेले पड़” गए। उनकी हालत “न इधर के रहे न उधर के” जैसी हो गई ?
बताया जाता है कि उन्होंने भाजपा में “वापसी के लिए कई बड़े नेताओं के चक्कर काटे, पर दरवाजा नहीं खुला”। अब वह स्वामी प्रसाद पर ही “भाजपा का एजेंट होने और विपक्षी एकता तोड़ने का आरोप” लगा रहे हैं। “सियासी गलियारों” में इसे अपनी नई राजनीतिक “जमीन तलाशने की कवायद” माना जा रहा है। चर्चा है कि वह “कांग्रेस या फिर सपा में वापसी” के लिए “जीभ लपलपाए” घूम रहे हैं। देखना होगा कि “मेरा कोई सगा नहीं” वाली “सियासत” करने वाले बृजेश को कोई “दल अपनाता है या नहीं”।
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