
- शरद मिश्रा
बांदा। बुंदेलखंड की धरती “वीरता और भक्ति” दोनों के लिए जानी जाती है। इसी “धरती के हृदय स्थल” बांदा शहर के बाबूलाल चौराहे पर “विराजमान हैं बुंदेलखंड की महत्वपूर्ण शक्ति पीठ मां काली देवी”। यह सिर्फ “एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था का वह केंद्र” है, जहां “मराठा साम्राज्य की गौरव गाथा और मां की अलौकिक शक्ति एकाकार” होती है।
मान्यता है कि यह वही स्थान है, जहां 1857 के आसपास कालींजर दुर्ग पर आक्रमण करने आए एक मराठा शासक के साथ चल रही “साक्षात काली मां रूठ कर ठहर” गई थीं। राजा के साथ चलने से मना कर “मां ने यहीं अपना स्थायी निवास” बना लिया। जहां कभी “घनघोर जंगल था, आज वहां भक्तों का सैलाब” है। यही कारण है कि “यह मंदिर बुंदेलखंड की जागृत पीठों में गिना” जाता है।
इतिहास भी इसकी “प्राचीनता का साक्षी” है। 1870 से पहले के राजस्व अभिलेखों में यह मंदिर राजकरन मेहता के नाम दर्ज है। 1942 में विष्णु करण मेहता और 1947 में व्यापारी गोटीराम और रमाशंकर गुप्त ने इसका “जीर्णोद्धार” कर इसे और भव्य बनाया। आज “मंदिर को शक्तिपीठों की तर्ज पर नया स्वरूप” दिया गया है। इसका 11 मंजिला विशाल मुख्य द्वार दूर से ही भक्तों को अपनी ओर खींचता है, जबकि “मुख्य शिखर पर स्थापित पांच कलश इसकी दिव्यता में चार चांद” लगाते हैं।
यहां पूरे वर्ष “साधकों का जमावड़ा” लगा रहता है, लेकिन “शारदीय और चैत्र नवरात्र में तो नजारा अलौकिक” होता है। दूर-दूर से “श्रद्धालु मां के दरबार में हाजिरी” लगाते हैं। मंदिर के पुजारी कहते हैं, जो भी सच्चे मन से मां के दरबार में आता है, मां काली उसकी हर मुराद पूरी करती हैं। तभी तो रोजाना “दर्जनों भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर कृतज्ञता का चढ़ावा” लेकर पहुंचते हैं। यह “मंदिर बांदा की पहचान और बुंदेलखंड की शक्ति का प्रतीक” है।
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