
- विनोद मिश्रा
बांदा। तिंदवारी विधान सभा हेतु समाजवादी में “विधानसभा टिकट” के लिये सपा के राष्ट्रीय महासचिव विशंभर निषाद एवं सपा के वरिष्ठ नेता अशोक सिंह गौर में “टिकट के लिये कांटे” का “राजनीतिक युद्ध” शुरू हो गया है, सूत्रों की मानें तो तिंदवारी विधान सभा क्षेत्र में अशोक सिंह गौर अपनी “लोकप्रियता” “के चलते विशंभर निषाद के ग्राफ को काफी पीछे कर चुके हैँ ? क्षेत्र में विशंभर निषाद की अनुपस्थिति औऱ अशोक सिंह गौर का क्षेत्रीय समस्याओं के निराकरण के लिये निरंतर सक्रियता के साथ ही “सोने में सुहागा” यह की वह निषादों के बीच भी पकड़ उनकी स्थिति को “सोने में सुहागा” कर देती है !
ब्राह्मण, वैश्य, प्रजापति वोट बैंक को अपने पाले में अपने “जन सेवक छवि से व्यक्तिगत रूप” से “प्रभाव” में लिये हुये हैं। वैसे भी टिकट की दावेदारी में इस पार्टी से प्रमुख रूप से तीन दावेदारों के नाम की ही विशेष चर्चा हैं। विशंभर निषाद एवं अशोक सिंह गौर। तीसरा नाम दीपा सिंह गौर का हैं, जों अशोक सिंह गौर की पत्नी औऱ “तीन बार डीडीसी” रह चुकी हैं। जहां तक विशंभर निषाद की बात हैं “वह तीन बार इस क्षेत्र से विधायक एवं मंत्री दो बार के सांसद औऱ वर्तमान में संगठन के राष्ट्रीय महासचिव” हैं।
लेकिन क्षेत्र में “उनकी दूरी जनता से कट सी चुकी” मानी जाती है। वहीं निषाद वोटों पर भाजपा विधायक एवं जल शक्ति राज्य मंत्री रामकेश निषाद का “एक छत्र पकड़ सी कायम” है, इससे विशंभर निषाद का प्रभावी वोट “बैंक यहां बिखरा” हुआ सा माना जा रहा है ! वहीँ अशोक सिंह गौर सपा के जुझारू नेता छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष एवं पार्टी की जिला इकाई के अलावा प्रदेश इकाई में भी “पद संभाल” चुके हैं। अपने गांव पिपरहरी के प्रधान भी रहें हैं। क्षेत्र में सक्रिय राजनीति के “पुरोधा” मानें जाते हैं !
इनकी पत्नी दीपा सिंह गौर नें अपने तीन वर्षीय डीडीसी कार्यकाल में “विकास कार्यों” की “लंबी श्रंखला” खड़ी की हैं। सपा नें 2017 में इन्हें विधान सभा का टिकट दिया था बाद में यह सीट सपा नें कांग्रेस “गठबंधन” के लिये छोड़ दी थी। दीपा सिंह को पार्टी नें जिला पंचायत अध्यक्ष का भी “टिकट” दिया लेकिन उन्होंने “इंकार” कर दिया था। अब वह “महिला कोटे के तहत तिंदवारी से टिकट मांग” रही हैं।
कुल मिलाकर “टिकट” तो अन्य भी “सपाई” चाहते हैं, लेकिन मुख्य रूप से इन “तीन नामों” पर ही “घमासान” हैं। सूत्रों की सही मानें तो विशंभर निषाद की जातीय आधार पर “दावेदारी कमजोर” हो चुकी है? इन राजनीतिक परिस्थितयों में समय आने पर “टिकट की लाटरी इनमें किसकी खुलती है यह लोगों में भारी उत्सुकता” है।
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