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October 13, 2026
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स्वास्थ्य व्यवस्था का 'नंगा' भ्रष्टाचार: लॉन्ड्री बनी शोपीस, ठेकेदार और अधिकारी 'मालामाल'
उत्तर प्रदेश

स्वास्थ्य व्यवस्था का ‘नंगा’ भ्रष्टाचार: लॉन्ड्री बनी शोपीस, ठेकेदार और अधिकारी ‘मालामाल’

शरद मिश्रा सम्पादक सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • शरद मिश्रा

बांदा। जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत ऐसी हो चुकी है जैसे “लागा चुनरी में दाग बिछाऊ कैसे” सरकारी अस्पतालों की चादरें अब गंदगी और भ्रष्टाचार की कहानी बयां कर रही हैं। लखनऊ की एक प्राइवेट एजेंसी के नाम पर चल रहे चादर धुलाई-सफाई के ठेके ने व्यवस्थाओं की पोल खोल दी है। ठेकेदार और अफसरों की मिलीभगत से मरीजों के लिए तय सुविधाएं सिर्फ कागजों पर रह गई हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था का 'नंगा' भ्रष्टाचार: लॉन्ड्री बनी शोपीस, ठेकेदार और अधिकारी 'मालामाल'

जिला अस्पताल, ट्रॉमा सेंटर और आठों सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में यह स्थिति आम है। कभी सिकुड़ी, मैले-कुचैले चादरें बिस्तर पर बिछा दी जाती हैं, तो कभी मरीजों को चादर के लिए स्टोर तक दौड़ लगानी पड़ती है। जबकि प्रति चादर धुलाई और सफाई के नाम पर 40 रुपये प्रतिदिन का भुगतान किया जाता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और है न सफाई का प्रमाण, न धुलाई का कोई सबूत !

स्वास्थ्य व्यवस्था का 'नंगा' भ्रष्टाचार: लॉन्ड्री बनी शोपीस, ठेकेदार और अधिकारी 'मालामाल'

स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, जिले के जिला अस्पताल में 103 बेड, ट्रॉमा सेंटर में 29 बेड, और प्रत्येक सीएचसी में 30-30 बेड हैं। यानी कुल मिलाकर सैकड़ों चादरें रोज़ धुलने और बदलने का दावा किया जाता है। पर हकीकत में अधिकतर वार्डों में हफ्तों पुरानी चादरें बिना धुले पड़ी रहती हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था का 'नंगा' भ्रष्टाचार: लॉन्ड्री बनी शोपीस, ठेकेदार और अधिकारी 'मालामाल'

नियम के मुताबिक, हर दिन चादरों के रंग बदलने का निर्देश है सोमवार को सफेद, मंगलवार को नीला, बुधवार को हरा आदि। लेकिन इन नियमों का पालन कागज़ों तक ही सीमित है। अधिकतर बेड पर गंदे और सिकुड़े चादरें दिखती हैं। कुछ बिस्तर तो इतने पुराने हो चुके हैं कि उन पर चादर बिछाने लायक भी नहीं बचे।

स्वास्थ्य व्यवस्था की 'शर्मनाक हकीकत' : डॉक्टर और दलालों द्वारा मरीजों का आर्थिक शोषण

ट्रॉमा सेंटर में तो स्थिति और बदतर है। यहां मरीजों को खुद स्टोर से चादर मांगनी पड़ती है। कई बेड कंडम हालत में पड़े हैं, फिर भी उनका रिकॉर्ड भुगतान सूची में जोड़ा जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की फाइलों में हर चादर की धुलाई का पूरा हिसाब है भुगतान की रकम से लेकर रंग बदलने के दिन तक सब दर्ज है। लेकिन इन फाइलों में दर्ज सफाई सिर्फ़ “कागज़ की सफाई” है।

जिला अस्पताल की नहीं बज रही सिटी: मरीज ढाई माह से हैं परेशान

मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. बृजेन्द्र कुमार और जिला अस्पताल के सीएमएस के. कुमार का कहना है “बेड शीट की सफाई और धुलाई का ठेका लखनऊ की एजेंसी को दिया गया है। प्रतिदिन रंग बदलने और साफ चादर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी एजेंसी की है। यदि गंदी चादरें बिछाई जा रही हैं तो जांच कराई जाएगी।” लेकिन प्रश्न यह है कि हर महीने लाखों रुपये भुगतान होने के बावजूद अब तक जांच की जरूरत क्यों महसूस नहीं हुई?

 

 

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

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