विनोद मिश्रा
बांदा।अजब-गजब का शौर्य और जज्बे की मिसाल बुन्देलखंड की बेटी नें महिला सशक्तीकरण का इतिहास रच दिया हैं। जी हाँ “संध्या “अपने इस नाम के मायने को मात देने वाली बुंदेलखंड की एक महिलाहै । जिक्र सिर्फ इसलिए कि घर-परिवार और समाज के लिए वह नया सवेरा बनी हुई है। वह कटनी रेलवे स्टेशन पर कुली नंबर-36 के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है और रेलवे के लिए भी कुछ खास है।

महिला सशक्तीकरण की बात आते ही उसका नाम लिया जाता है। वह अपना पूरा नाम संध्या मारावी बताती है। बांह पर पहने पीतल के कुली नंबर-36 के बिल्ले को भी दिखाती है मानो नाम और काम के 36 के आंकड़े को समझा रही हो। 65 पुरुष कुलियों के बीच वह अकेली महिला कुली हैं। संध्या अपने इस नाम के मायने को मात देने वाली बुंदेलखंड की एक महिला। जिक्र सिर्फ इसलिए कि घर-परिवार और समाज के लिए वह नया सवेरा बनी हुई है। वह कटनी रेलवे स्टेशन पर कुली नंबर-36 के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है और रेलवे के लिए भी कुछ खास है।

संध्या को घर से कटनी रेलवे स्टेशन तक आने के लिए जबलपुर से रोज 45 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। 2016 में बीमारी से पति की मौत के बाद पहले यह मजबूरी थी। अब लक्ष्य बन गया है। वह कहती है, काम कोई छोटा नहीं होता, सोच और संकोच छोटा होता है।संध्या की मंशा है कि उसके बच्चे पढ़-लिखकर भारतीय सेना में शामिल हों। तीन छोटे बच्चों के अलावा घर में बूढ़ी सास भी हैं। अखिल भारतीय बुंदेलखंड विकास मंच के राष्ट्रीय महासचिव नसीर अहमद सिद्दीकी का कहना है कि बुंदेलखंड में संध्या जैसे हौसलों वाली महिलाओं की खासी तादाद है। उन्हें अवसर और प्लेटफार्म की जरूरत है।बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती संध्या
पति की मौत के बाद भी हिम्मत नहीं खोईमूलरूप से मध्यप्रदेश के जबलपुर की रहने वाली संध्या मारावी के मजदूर पेशा पति की मौत बीमारी के चलते 22 अक्तूबर 2016 को हो गई थी। तीन छोटे बच्चों के अलावा कुनबे में उसकी बूढ़ी सास भी हैं। पति की मौत के बाद विधवा हो गई। संध्या ने अपनी हिम्मत और हौसला नहीं खोया। कुनबे की परवरिश का जिम्मा उसी के कंधों पर आ पड़ा। पेट की भूख और बच्चों संग बूढ़ी सास की परवरिश की खातिर इस बोझ को उसने अपने सिर पर उठा लिया और कुली बन गई।

महिला कुली के रूप में संध्या जनवरी 2017 से काम कर रही है। उसके तीन बच्चों 8 वर्षीय साहिल, 6 वर्षीय हर्षित और 4 वर्ष की पुत्री पायल है। संध्या खुद 8वीं कक्षा तक पढ़ाई की है। वह अपने तीनों बच्चों को प्राइमरी स्तर की शिक्षा रोजाना घर पर ही दे रही है। ड्यूटी से आने के बाद बच्चों को नियमित रूप से पढ़ाती हैं। संध्या का कहना है कि वह नहीं चाहती की उसके बच्चे भी अपने पिता भोलाराम मरावी या मां संध्या की तरह किसी का बोझा ढोएं। संध्या के पति भी कुली थे।

रेलवे विभाग ने कुली की भर्ती की शर्तों में कुछ बदलाव किए हैं। पहले जहां कुली का लाइसेंस-बिल्ला हासिल करने के लिए 8वीं पास योग्यता निर्धारित थी उसे अब बढ़ाकर 10वीं कर दी है। भर्ती नियमों में भी बदलाव हुआ है। साथ ही साइकिल चलाना भी अनिवार्य है। भर्ती के समय 50 किलो वजन लेकर 200 मीटर दौड़ाया जाता है। कुलियों का भाड़ा भी रेलवे विभाग ने तय कर रखा है। मौजूदा समय में यह दर एक रुपये प्रति किलो के हिसाब से है। भाड़ा ढोने की दूरी भी रेलवे विभाग ने 200 मीटर निर्धारित कर रखी है। यानी सामान का वजन जितना होगा, उसी दर से यात्री को मेहनताना अदा करना होगा। निर्धारित दर से अधिक लेने पर रेलवे कुली के विरुद्ध कार्रवाई कर सकता है।

कोरोना संक्रमण के चलते पूरे देश में लगाए गए लॉकडाउन के दौरान जहां ट्रेनों का संचालन ठप हुआ तो कुलियों की हालत भी काफी पतली हो गई। रोज कमाने-खाने वाले लाल वर्दीधारी मजदूर पेशा कुली कोरोना संक्रमण के दौरान आर्थिक रूप से बुरी तरह टूट गए। ट्रेनें बंद रहीं और रेलवे स्टेशन वीरान रहे। अब कुछ ट्रेनों के शुरू हो जाने से इनकी जिंदगी फिर आहिस्ता-आहिस्ता पुराने ढर्रे पर लौटने लगी है और रोजी-रोटी भी चलने लगी है। रेलवे यात्रियों के लिए काफी अहम साबित होने वाले कुली काफी दिनों से यह मांग कर रहे हैं कि रेलवे विभाग उन्हें ग्रुप-डी की नौकरी दी जाए, ताकि परिवार का पालन-पोषण कर सकें। कई कुलियों ने बताया कि छोटे रेलवे स्टेशनों में कुलियों को काम नहीं मिल पाता। अक्सर तो 200 रुपये भी रोजाना नहीं कमा पाते हैं।

( शरद मिश्रा- संपादक )
( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )



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