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October 13, 2026
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बांदा के व्यंग कार कैलाश मेहरा का कतरने भाग दो का व्यंग्य संग्रह: साहित्य जगत में धमाल
उत्तर प्रदेश

बांदा के व्यंग कार कैलाश मेहरा का कतरने भाग दो का व्यंग्य संग्रह: साहित्य जगत में धमाल

  • विनोद मिश्रा

बांदा। जन कवि केदारनाथ अग्रवाल की धरती बांदा में जनवादी कवि, कथाकार, लेखक आलोचक तथा श्रमजीवी पत्रकार तो बहुतायत में हैं हीं, व्यंग्य लेखक भी कम नहीं हैं। व्यंग्य लेखकों की श्रृंखला में एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में कैलाश मेहरा का नाम उभर कर सामने आया है। उनका दूसरा व्यंग्य संग्रह “कतरनने भाग 2” के नाम से आया है। माया प्रकाशन कानपुर से प्रकाशित इस व्यंग्य संग्रह में कुल जमा 126 व्यंग्य हैं। इन व्यंग्य संग्रहों का काल खंड 11 जून 2003 से 9 जून 2021 तक का है।

बांदा के व्यंग कार कैलाश मेहरा का कतरने भाग दो का व्यंग्य संग्रह: साहित्य जगत में धमाल
Satire collection of Banda’s satire Kailash Mehra’s Katarne part two: A blast in the literary world

अर्थात कैलाश मेहरा के इस दूसरे व्यंग्य संग्रह में 18 साल तक उनके लिखे गए व्यंग्य अपनी हाजिरी दर्ज कराते नजर आ रहे हैं।
केलाश मेहरा का पहला व्यंग्य संग्रह “कतरने भाग 1” के नाम से “लोकोदय प्रकाशन” लखनऊ से छपा था। उनके प्रथम व्यंग्य संग्रह की भरपूर चर्चा इसलिए भी हुई थी कि उन्होंने इस व्यंग्य संग्रह में न्याय व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने की पुरजोर कोशिश की थी, जबकि वे स्वयं न्याय व्यवस्था के एक अंग हैं। अर्थात वे एक वरिष्ठ वकील हैं, लेकिन जब जब सामाजिक विसंगतियाँ उनको बेचैन करती हैं, तो वे अपनी तड़प, संवेदना,आक्रोश तथा छटपटाहट को व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त करके अपने संताप पर खुद ही मरहम लगाने का काम करते हैं।

कैलाश मेहरा के व्यंग्य बहुधा हथौड़े की तरह हमलावर तो नहीं होते, लेकिन चींटी की तरह च्यूँटी काटते हैं, तो अपना असर और लाल मिर्ची जैसा सुर्ख निशान जरूर छोड़ जाते हैं। जैसे “घूस सुरक्षा बिल” इस व्यंग्य में वे कहते हैं कि “सरकार की जय हो ! आपने खाद्य सुरक्षा बिल यानी फूड सिक्योरिटी बिल यानी खाने में मील खाओ, राशन खाओ, कोमनवेल्थ खेल खा जाओ, चाहो तो तोप और हेलीकाप्टर खा जाओ।” इसी तरह अक्टूबर 2019 का एक अन्य व्यंग्य है “समरथ को नहि दोष गुसाईं”।

बांदा के व्यंग कार कैलाश मेहरा का कतरने भाग दो का व्यंग्य संग्रह: साहित्य जगत में धमाल
Satire collection of Banda’s satire Kailash Mehra’s Katarne part two: A blast in the literary world

यहाँ लेखक हताश भाव से कहता है कि मैं कभी भी माननीय यानी विधायक या सांसद नहीं बन सकता, क्योंकि मेरे ऊपर कोई आपराधिक मामला न तो कोतवाली में दर्ज है और न ही न्यायालय में संगीन मामला है। उनका एक व्यंग्य “शौचालय आयोग” सरकारी तंत्र को बुरी तरह बेनकाब करता है। इसी तरह का एक और व्यंग्य “आँकड़ा आयोग” भी सरकारी तंत्र की लूट और मनमानी की धज्जियां उड़ाता है। “देश उल्लू है क्या ?” इस व्यंग्य में वे इंगित करते हैं कि जैसे उत्पाद बनाने वाली कंपनियाँ वैधानिक चेतावनी भी देतीं हैं। इसी तर्ज पर राजनीतिक दलों को भी वैधानिक चेतावनी देनी चाहिए कि हमारी पार्टी को अपने रिस्क पर वोट दें।

वादे पूरे न कर पाएं, तो मजबूरी समझ नजर अंदाज़ कर दें”। “बजट का मार्च पास्ट”। वे चाबुक चलाते हैं कि मार्च का महीना है। इसमें “आँधी के आम” लूटना मजबूरी है। बाँदा में तो एक तालाब ही गायब हो गया है। “तालाब जो हिरा गया” l इस व्यंग्य में कैलाश मेहरा का अंदाज ए बयां कुछ यूँ है ! सरकारी और गैर-सरकारी जमीनों, भवनों आदि पर तो नाजायज कब्जे होते ही रहे हैं, लेकिन बाँदा शहर का डिग्गी तालाब ? “इस तालाब को कलियुग के तमाम अगस्त्य मुनि पी गये हैं और डकार तक नहीं ली ?”

 

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

 

 
 



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