- विनोद मिश्रा
बांदा। कोरोना संक्रमण काल में कई नए समस्या भी विकराल रूप लेकर सामने आयी है, जिनमें सबसे अधिक इस वायरस संक्रमण के रोकथाम में इस्तेमाल किए गए ग्लव्स, मास्क,दास्ताने, पीपीई किट समेत नए किस्म के खतरनाक कचड़े हैं, इनमें संक्रमण का खतरा बढ़ गया है। जिस तरह कोविड-19 संक्रमण रोकथाम को लेकर सरकार ने सार्वजनिक जगहों पर थूकना मना कर दिया है, ठीक उसी तरह इन बायोमेडिकल वेस्ट के निस्तारण भी काफी महत्वपूर्ण है ।

शासन के कड़े निर्देशों के बावजूद अस्पतालों के मेडिकल वेस्ट को लेकर अभी भी लापरवाही बरती जा रही है। निस्तारण के लिए जहां कंपनियों को लाखों रुपये का टेंडर दिया गया है। वहीं अस्पताल के कर्मचारियों की ओर से इसकी उठान करने में चूक की जाती है। रास्ते में बिखरने वाला कचरा संक्रमण फैलाने का बड़ा कारक बन सकता है। पर्यावरण भी इससे दूषित होता है।
कोविड -19 राजकीय मेडिकल कॉलेज व जिले के अन्य अस्पतालों के कचरे के निस्तारण के लिए अलग-अलग कंपनियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। जिससे नियमित रूप से मेडिकल वेस्ट का निस्तारण हो सके। जिला अस्पताल व जिले के अन्य अस्पतालों का ठेका शहर के बाहर मोहनपुरवा गांव में बने प्लांट को दिया गया है। जिसमें प्रति बेड 35 रुपये 50 पैसे शुल्क कंपनी को देय निर्धारित है। प्लांट की ओर से अस्पतालों का मेडिकल वेस्ट उठान के लिए तीन लोडर लगाए गए हैं। रोजाना जनपद में करीब सवा क्विंटल से डेढ़ कुंतल तक कचरा निकल रहा है। लेकिन अस्पताल कर्मी मेडिकल वेस्ट को डंपिग हाउस के अंदर या कंपनी के वाहनों में डालने की जगह कई बार खुले में फेंककर चले आते हैं। अस्पताल के पीछे खुले में फैले कचरे से वातावरण दूषित होने के साथ संक्रमण फैलने का खतरा रहता है। इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है।

इसी तरह मेडिकल कॉलेज में अलग से करीब दो करोड़ की लागत से इंसलेटर लगा है। उसके संचालन की जिम्मेदारी लखनऊ की कंपनी को दिया गया है। प्रतिमाह 400 से 500 टन मेडिकल वेस्ट निकल रहा है। लेकिन वहां भी इसका निस्तारण सही समय पर नहीं हो रहा है। ज्यादा समय तक कचरा पड़ा रहना संक्रमण के फैलाव का कारक बन रहा है। इसकी शिकायत भी प्रशासनिक अधिकारियों से की गई है। हालांकि इसके पीछे जो बात सामने आई है। उसमें इंसलेटर के चलाने में एक घंटे के अंदर 50 से 60 लीटर डीजल का खर्च आता है। इससे समय-समय पर इसको चलाया जाता है।

डॉ. एनडी शर्मा (सीएमओ) का कहना है कि बायो मेडिकल वेस्ट निस्तारण में यदि किसी तरह की लापरवाही सामने आती है। दोषी कर्मचारी को निलंबित किया जाएगा। फिलहाल अभी तक ऐसी शिकायत सामने नहीं आई है।

– कबाड़ियों को बेचा जा रहा है मेडिकल वेस्ट
जनपद में अस्पतालों के कचरा निस्तारण में कमाई को लेकर भी लापरवाही की जा रही है। प्लास्टिक बेचने के चक्कर में अस्पताल के सफाई कर्मी कचरे को कबाड़ियों को तौला देते हैं। कबाड़ के रूप में दुकानों में गया कचरा भी संक्रमण फैलाता है। जिम्मेदार अधिकारियों को इसमें रोक लगानी चाहिए।- पीपीईकिट व दस्तानों को फेंकने में होती लापरवाहीमरीजों की कोरोना जांच करने वाले कर्मचारी पीपीईकिट व दस्तानों को जलाने की जगह कई बार खुले में फेंक देते हैं। इससे भी संक्रमण फैल रहा है। स्टेशन के नजदीक भी पीपीई किट इसी तरह लोगों को पड़ी मिली। तो आम लोगों ने भी इसकी शिकायत अधिकारियों से की है। इसी तरह जिला अस्पताल के पीछे भी चार दिन पहले पीपीई किट व दस्ताने बिखरे मिले थे। अंतिम संस्कार को जो कर्मचारी व मृतक के स्वजन दस्ताने व बचाव के अन्य किट पहनते हैं। वह भी कई बार खुले में फेंकते हैं। जबकि उन्हें इस्तेमाल के बाद जलाया जाना जरुरी है।

( शरद मिश्रा- संपादक )
( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )



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