
- विनोद मिश्रा
चित्रकूट। यह “खबर चौंकाती भी है और डराती” भी। धर्मनगरी चित्रकूट में “एक पूरी नदी ही गायब” हो गई है। रामघाट के “अस्तित्व से जुड़ी सरयू नदी कागजों” में तो आज भी “बड़ी नदी के रूप में दर्ज” है, लेकिन “धरातल पर उसका नामोनिशान मिट” चुका है। बाढ़ के तांडव के बाद हुए “खुलासे” ने पूरे “प्रशासनिक अमले” को “हिला” कर रख दिया है। मामला सिर्फ “एक नदी के विलुप्त होने का नहीं,बल्कि सिस्टम की सालों की अनदेखी” का है। स्थानीय लोगों के अनुसार “सरयू के दर्जनों छोटे-बड़े स्रोतों और नालों को धीरे-धीरे पाट” दिया गया। नदी की जमीन पर कहीं “पक्के मकान” तान दिए गए तो “कहीं बड़े अतिक्रमण खड़े” हो गए।
प्रशासन ने “सैटेलाइट तकनीक और राजस्व नक्शों” से कभी मिलान करने की “जहमत” ही नहीं उठाई। इस अतिक्रमण का “खामियाजा” अब मां मंदाकिनी को “भुगतना पड़” रहा है। सरयू का जल प्रवाह “प्राकृतिक रूप” से मंदाकिनी में मिलता था। “रास्ता बं”द होने से मंदाकिनी पर “जल संकट” गहरा गया है और उसका “अस्तित्व भी खतरे में पड़” गया है। अगर समय रहते कदम नहीं उठे तो “रामघाट का भूगोल ही बदल” जाएगा। “बाढ़ के बाद जब रामघाट डूबा” तो जिलाधिकारी पुलकित गर्ग ने इस “गायब नदी का संज्ञान” लिया।
उनकी पहल पर जिले में पहली बार “किसी नदी की तलाश” के लिए “हाईटेक वैज्ञानिक सर्वे” शुरू हुआ है। राजस्व, सिंचाई और जल निगम की संयुक्त टीम “सैटेलाइट इमेज और अत्याधुनिक रोवर” तकनीक से “सरयू की पुरानी धारा” को “ट्रेस” कर रही है। 50 साल पुराने राजस्व नक्शे और मौजूदा “सैटेलाइट तस्वीरों” का मिलान कर “सीमांकन” किया जा रहा है कि नदी कहां से बहती थी और “किस-किस ने उसकी जमीन पर कब्जा” किया है। अब विचारणीय यह है की क्या तकनीक कागजों में जिंदा नदी को जमीन पर वापस ला पाएगी? पूरे देश की “निगाहें अब इस सर्वे रिपोर्ट” पर टिकी हैं।
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