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October 13, 2026
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इक्यावन किलो लड्डू वाले 'प्रिंस': युवा चिंतक से रामायण मेला अध्यक्ष तक, शंकराचार्य के प्रिय शिष्य की कहानी
उत्तर प्रदेशबुंदेलखंड

इक्यावन किलो लड्डू वाले ‘प्रिंस’: युवा चिंतक से रामायण मेला अध्यक्ष तक, शंकराचार्य के प्रिय शिष्य की कहानी

विनोद मिश्रा डायरेक्टर सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • विनोद मिश्रा

चित्रकूट। नाम है प्रशांत करवरिया, पर लोग प्यार से ‘प्रिंस’ बुलाते हैं। वजह भी खास है। जिस मड़फा दुर्ग को कभी दस्यु सम्राट ददुआ और ठोकिया के नाम से जाना जाता था, उसी बीहड़ में आज यह युवा धर्म, शिक्षा और स्वास्थ्य की अलख जगानें में सहयोगी है। 51 किलो का महालड्डू चढ़ाने की खबर से पुनः सुर्खियों में आए प्रिंस करवरिया का कृतित्व लड्डू से कई गुना बड़ा है।

इक्यावन किलो लड्डू वाले 'प्रिंस': युवा चिंतक से रामायण मेला अध्यक्ष तक, शंकराचार्य के प्रिय शिष्य की कहानीप्रिंस करवरिया सिर्फ राष्ट्रीय रामायण मेला के कार्यकारी अध्यक्ष ही नहीं हैं। बल्कि वो सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्र के युवा चिंतक भी हैं। “चित्रकूट की पहचान राम” से है और “रामायण मेला यहां की आत्मा”। इस आत्मा को देश-दुनिया तक पहुंचाने का जिम्मा प्रिंस के कंधों पर है। उनके नेतृत्व में रामायण मेला सिर्फ आयोजन नहीं, सांस्कृतिक आंदोलन बन गया है।

इक्यावन किलो लड्डू वाले 'प्रिंस': युवा चिंतक से रामायण मेला अध्यक्ष तक, शंकराचार्य के प्रिय शिष्य की कहानीगोवर्धन पीठ के शंकराचार्य अधोछानंद गिरी महाराज के प्रिय शिष्यों में प्रशांत करबरिया(प्रिंस) का नाम है। गुरु की प्रेरणा से ही उन्होंने मड़फा दुर्ग के प्राचीन शिव मंदिर में 51 किलो का लड्डू चढ़ाया। लेकिन असली कहानी लड्डू से आगे शुरू होती है।

इक्यावन किलो लड्डू वाले 'प्रिंस': युवा चिंतक से रामायण मेला अध्यक्ष तक, शंकराचार्य के प्रिय शिष्य की कहानीशंकराचार्य ने जिस बीहड़ में वेदज्ञान विश्वविद्यालय और अस्पताल बनाने का संकल्प लिया, प्रिंस उसके सूत्रधार में से एक बन गये हैं। जहां कभी गोलियां चलती थीं, वहां अब वेद की ऋचाएं गूंजेंगी। जहां डर था, वहां अब इलाज होगा। प्रिंस दिन-रात इसी प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारने में शंकराचार्य के सहयोगी की भूमिका में हैं।

इक्यावन किलो लड्डू वाले 'प्रिंस': युवा चिंतक से रामायण मेला अध्यक्ष तक, शंकराचार्य के प्रिय शिष्य की कहानीप्रिंस करवरिया की खासियत है कि वो धर्म को राजनीति से नहीं, सेवा से जोड़ते हैं। उनका मानना है कि मंदिर सिर्फ पूजा की जगह नहीं, समाज बदलाव का केंद्र होना चाहिए। इसीलिए मड़फा दुर्ग में मंदिर जीर्णोद्धार के साथ विश्वविद्यालय और अस्पताल की नींव रखी जा रही है। स्थानीय आदिवासी बताते हैं की “प्रिंस भैया जब आते हैं तो लगता है अपना कोई आ गया”। बीहड़ की समस्या को बीहड़ की भाषा में समझते हैं।

इक्यावन किलो लड्डू वाले 'प्रिंस': युवा चिंतक से रामायण मेला अध्यक्ष तक, शंकराचार्य के प्रिय शिष्य की कहानी51 किलो के लड्डू की चर्चा हर तरफ है। पर प्रिंस कहते हैं, यह तो शुरुआत है। गुरु जी का सपना है कि मड़फा दुर्ग को नालंदा की तरह ज्ञान का केंद्र बनाएं। लड्डू तो प्रसाद है,असली भोग तो सेवा से लगेगा।  राजनीति में सक्रिय होते हुए भी विवादों से दूर, धर्म के साथ आधुनिकता का संगम, और बीहड़ में विकास का सपना। यही है प्रिंस करवरिया का व्यक्तित्व। चित्रकूट का ये ‘प्रिंस’ वाकई रियासतों वाला नहीं, संकल्पों वाला राजकुमार है।

 
 



Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh
 





 

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