
- विनोद मिश्रा
बांदा। “कहां छुप गये कठोर तुम्हें खोजने वाला प्रशासन दर -दर की ठोकरें” खा रहा है। “मायूस” हो गया है। जी हाँ, हम चर्चा कर रहें हैं “तालाबों की जो गुम” हो गये हैं। यह किसी “तिलिस्म भरी कहानी” से कम नहीं है। जिले में 2575 तालाब खत्म होने की हालत में पाए गए। “602 तालाब अफसरों को खोजें नहीं” मिले।

शहर के अलावा मनरेगा से खोदे गए तालाबों में भी ऐसा ही “गड़बड़झाला” है। उदाहरण के तौर पर बांदा शहर के प्रमुख प्राचीन तालाब जल संरक्षण के सरकारी दावों की पोल खोलने के लिए काफी हैं। चिराग तले अंधेरा की स्थिति है। इन तालाबों की न तो मरम्मत हो रही है न ही संरक्षण।

प्रागी तालाब, कंधरदास तालाब, छाबी तालाब, परशुराम तालाब आदि बदहाल और मिटने की कगार पर हैं। इन पर अवैध कब्जे हैं। मटौंध नगर में भी प्राचीन तालाब खत्म होने की कगार में हैं। सपा सरकार में शुरू हुई खेत तालाब योजना की जमीनी हकीकत मौके पर जाकर देखने से स्वतः उजागर होगी। बुंदेलखंड में वर्ष 2012 तक 2069 प्राचीन तालाब राजस्व अभिलेखों से गायब हो चुके हैं।
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