
- विनोद मिश्रा
बांदा। जिले में वक्फ की संपत्तियों को “निगलने” का खेल बेरोकटोक चल रहा है। सरकारी कागजों में दर्ज होने के बाद भी कब्रिस्तान, ईदगाह, मदरसा और मजारों की जमीनों पर अवैध कब्जे बढ़ते जा रहे हैं और जिम्मेदार आंख बंद किए बैठे हैं। शासन के आदेश पर हुए सत्यापन ने खुद इस बात की पुष्टि कर दी है कि जिले की 875 वक्फ संपत्तियों में से 827 संपत्तियां सार्वजनिक उपयोग की सरकारी भूमि पर दर्ज हैं। यानी यह जमीनें किसी की निजी नहीं, बल्कि कौम की धरोहर हैं। लेकिन हकीकत में इनमें से ज्यादातर पर अतिक्रमणकारी कुंडली मारे बैठे हैं।
केंद्र के वक्फ संशोधन विधेयक के बाद जनवरी में डीएम के निर्देश पर जिले की सदर, अतर्रा, बबेरू, नरैनी और पैलानी तहसीलों की वक्फ संपत्तियों का सत्यापन कराया गया। वामसी पोर्टल और राजस्व रिकॉर्ड खंगालने पर पता चला कि जिले में मस्जिद, कब्रिस्तान, मजार, ईदगाह, इमामबाड़ा, मदरसा, खाली प्लाट, नाली-नाला सहित 827 संपत्तियां सरकारी भूमि पर वक्फ के नाम दर्ज हैं। लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और है। कब्रिस्तानों की जगह कॉलोनियां बन गईं, ईदगाह की जमीन पर दुकानें सज गईं और खाली प्लाटों पर मकान खड़े हो गए।
विचारणीय यह है की आखिर प्रशासन चुप क्यों है ? सूत्रों का कहना है कि शासन स्तर से ही वक्फ की जमीनों पर कब्जे के मामलों में विवाद मोल न लेने की नीति अपनाई जा रही है। इसी वजह से जिला प्रशासन भी आंख मूंदे हुए है ! वक्फ बोर्ड और स्थानीय जिम्मेदार भी मूकदर्शक बने हैं ! न कोई नोटिस, न कोई अतिक्रमण हटाओ अभियान। नतीजा दिन प्रतिदिन वक्फ की जमीनें सिकुड़ती जा रही हैं। जब कागजों में सब कुछ दर्ज है, सरकारी रिकॉर्ड में सब साफ है, तो फिर अवैध कब्जों पर बुलडोजर क्यों नहीं चल रहा ? क्या वक्फ की संपत्तियों को बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है ? प्रशासन की इस अनदेखी से आने वाले समय में वक्फ की बची-खुची जमीनें भी हाथ से निकलने का खतरा बढ़ गया है !
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