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October 15, 2026
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केन-बेतवा प्रोजेक्ट विकास या विनाश: सरकार की 'लाइफलाइन' बनी का 'मौत फरमान'?
उत्तर प्रदेश

केन-बेतवा प्रोजेक्ट विकास या विनाश: सरकार की ‘लाइफलाइन’ बनी का ‘मौत फरमान’?

विनोद मिश्रा डायरेक्टर सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • विनोद मिश्रा

बांदा। बुंदेलखंड की धरती पर अब “विकास” नहीं,बल्कि “विस्थापन का विस्फोट” हो रहा है। “केन-बेतवा” लिंक परियोजना, जिसे सरकार “विकास की गंगा” बता रही है, वहीं “आदिवासियों और किसानों” के लिए यह “जीवन पर सीधा हमला” बन गई है। जिनकी जमीन, जिनका जंगल, जिनकी “पीढ़ियों की पहचान दांव” पर लगी है वही लोग आज सड़कों पर हैं। अब उनका गुस्सा “आखिरी सीमा” पार करता दिख रहा है। बृहस्पतिवार को जो दृश्य सामने आया,उसने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया। आक्रोशित ग्रामीणों ने सांकेतिक फांसी लगाकर विरोध जताया।

केन-बेतवा प्रोजेक्ट विकास या विनाश: सरकार की 'लाइफलाइन' बनी का 'मौत फरमान'?

यह सिर्फ प्रदर्शन नहीं था यह था “सिस्टम के खिलाफ अंतिम चेतावनी”। आरोप साफ है “बिना पूरा मुआवजा,बिना पुनर्वास” लोगों को जबरन उजाड़ा जा रहा है ! यह आंदोलन अब साधारण विरोध नहीं रहा,बल्कि “जनआक्रोश की आग” बन चुका है। केन नदी में जल सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह, 10 दिन से जारी चिता आंदोलन और “गांव-गांव” चूल्हा बंद भूख हड़ताल। पूरा इलाका जैसे “सामूहिक प्रतिरोध” में बदल गया है। घरों में चूल्हा नहीं जला, लोग सड़कों पर डटे हैं और साफ कह रहे हैं,“जान देंगे, जमीन नहीं !” आंदोलनकारियों ने प्रशासन पर धोखाधड़ी, दमनकारी नीति और जबरन विस्थापन के गंभीर आरोप लगाए हैं।

केन-बेतवा प्रोजेक्ट विकास या विनाश: सरकार की 'लाइफलाइन' बनी का 'मौत फरमान'?

सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने दो टूक कहा “यह विकास नहीं,आदिवासियों का संगठित विनाश है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” पन्ना और छतरपुर प्रशासन के साथ हुई बातचीत भी पूरी तरह विफल रही। इसके बाद आंदोलनकारियों ने सीधी चेतावनी दे दी की पारदर्शी सर्वे करो, बिना कटौती पूरा मुआवजा दो और पहले पुनर्वास,फिर परियोजना। लेकिन प्रशासन की “खामोशी” ने आग में घी डालने का काम किया है।

केन-बेतवा परियोजना ने पकड़ी रफ्तार: सूखी धरती पर बहेंगी 'विकास की नहरें'

केन-बेतवा लिंक परियोजना, करीब 44,605 करोड़ रुपये की लागत वाली देश की पहली नदी जोड़ो योजना है। 10 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई, 62 लाख लोगों को पेयजल और 103 मेगावाट बिजली उत्पादन है। सरकार इसे “बुंदेलखंड की लाइफलाइन” बता रही है लेकिन प्रभावित लोग इसे “अपनी मौत का फरमान” कह रहे हैं। क्या हजारों परिवारों को बेघर करके विकास संभव है? क्या बिना न्याय, बिना पुनर्वास यह परियोजना सफल मानी जाएगी?

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

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