
- विनोद मिश्रा
बांदा। केन नदी “मर” रही है और “सरकार व जिला प्रशासन आंखें मूंदे तमाशा” देखता है ! “निगरानी” के नाम पर खदानों में लगाए गए “सीसीटीवी कैमरे महज दिखावा” होते हैं। यह “कैमरे प्रशासन की निगरानी में नहीं, खदान संचालकों की मर्जी से चलते” हैं। जब “लूटना” होता है तो “कैमरे का स्विच ऑफ और जब दिखावा” करना होता है तो ऑन। यही है “बांदा में खनन की निगरानी का कड़वा सच”।
नियम-कायदे सिर्फ “कागजों” में हैं। शाम छह बजे के बाद “खनन प्रतिबंधित” है, नदी की धारा में “खनन अपराध” है, “सक्शन मशीन पाप” है, लेकिन “हकीकत में रात के अंधेरे में केन की छाती पर जेसीबी गरजती” हैं। 20 से अधिक खदानों में दिन में “नियमों का नाटक और रात में खुली लूट” होती है।
बहादुरपुर स्योढ़ा की खदान ने तो “पूरे सिस्टम को नंगा” कर दिया। गाटा संख्या 300 एम और 316 एम के बाहर, सीधे “नदी की जलधारा में खनन” होता रहा और “प्रशासन को भनक तक नहीं” लगी। जांच में खुद पुष्टि हुई कि “कैमरे कई बार बंद” किए गए। सवाल यह है कि “कैमरे बंद होने पर किस अधिकारी ने नोटिस” लिया ? किसकी जिम्मेदारी तय हुई ? “जुर्माने का आदेश देकर खानापूर्ति” कर दी गई, लेकिन “मिलीभगत पर पर्दा डाल” दिया गया।
यदि एनजीटी का “डंडा” न चलता तो यह “लूट” कभी सामने ही न आती। यह साफ है कि बिना “अधिकारियों की शह के नदी में मानक से कई गुना गहरे गड्ढे नहीं खोदे” जा सकते। सरकार राजस्व का “ढिंढोरा” पीटती है, लेकिन “केन की कीमत पर वसूले गए इस राजस्व में कितने लोगों की जेबें गर्म” हो रही हैं, यह बताने वाला कोई नहीं। “जिले में खनन विभाग है, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड है, राजस्व अमला है, लेकिन केन आज भी अनाथ” है।
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